भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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दूसरा अध्याय ] ४१९ या केवल 'अग्नये अप्सुमते स्वाहा' से आहवनीय अग्नि में घी की आहुति दे दे। यही उसका प्रायश्चित्त है। अब प्रश्न है कि जब अग्निहोत्री की अग्नियाँ लाश की अग्नि से मिल जायें तो क्या प्रायश्चित्त है ? 'अग्नि शुचि' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनाये ! उसका याज्य मंत्र यह है :- अग्निः शुचिव्रततमः... ( ऋ० ८।४४।२१ ) अनुवाक्य यह है :- उदग्ने शुचयस्तव... ( ऋ० ८।४४।१७ ) या केवल 'अग्नये शुचये स्वाहा' से आहवनीय में घी की आहुति दे देवे। यही उसका प्रायश्चित्त है। अब प्रश्न है कि जिसकी अग्नियाँ अरण्य की अग्नि से मिल जावें उसका क्या प्रायश्चित्त है ? वह अरणियों से उस को पकड़ ले। और यदि संभव न हो तो आहवनीय या गार्हपत्य से एक जलती लकड़ी ले, और बचा रक्खे। यदि यह भी संभव न हो तो 'अग्नि संवर्ग' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनाये और ऊपर दिये याज्य और अनुवाक्यों का प्रयोग करे। या 'अग्नये संवर्गाय स्वाहा' से घी की एक आहुति दे देवे। यही उसका प्रायश्चित्त है। (६) ८-अब प्रश्न यह है कि यदि उपवास के दिन अग्निहोत्री हवि पर आँसू बहा दे तो क्या प्रायश्चित्त है ? वह 'अग्नि व्रत- भृत्' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनावे। उसका याज्य यह है :- त्वमग्ने व्रतभृच्छुचि... ( आश्व० ३।११ ) अनुवाक्य यह है :- व्रतानि विभ्रद् व्रतपा अदब्ध... ( आश्व० ३।११ )