ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें:४४८ [ सातवीं पञ्चिका मृगंगु के पुत्र राम ने उत्तर दिया कि "वह वीर पुरुष मैं हूँ"। यह राममार्गवेय श्यापर्ण था जिसने वेदों का अध्ययन किया था। जब श्यापर्ण उठने लगे तो उसने राजा से कहा, "हे राजन्, क्या तुम वेदी से ( मुझ जैसे ) वेदपाठी को भी निकाल दोगे ?" उसने पूछा, "हे ब्रह्म बंधु (ब्रह्मबंधु पतित ब्राह्मण को कहते हैं ), तू जो कोई हो बता तो सही कि तूने यह ज्ञान कहाँ प्राप्त किया ?" (१) २८—( राम ने उत्तर दिया ) कि "जब इन्द्र ने त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप का अपमान किया, वृत्र को मारा, यतियों को गीदड़ों के सामने फेंक दिया, अरुन्मखों को मार डाला, ( अपने गुरु ) बृहस्पति को धिक्कारा, तो देवों ने इन्द्र को निकाल दिया और सोमपान से वंचित कर दिया। जब इन्द्र सोमपान से बहिष्कृत हो गया तो अन्य सब क्षत्रिय भी सोमपान से वंचित हो गये। जब इन्द्र ने त्वष्टा से सोम चुरा लिया तो उसको भी उसमें से फिर भाग मिल गया ! परन्तु क्षत्रिय अब भी सोमपान के अधिकार से वंचित हैं। यहाँ केवल एक आदमी है जो जानता है कि किस प्रकार सोमपान से वंचित क्षत्रिय को फिर सोमपान का अधिकार मिल सकता है। तेरे नौकर ऐसे आदमी को वेदी से क्यों निकालते हैं ?" राजा ने पूछा, "हे ब्राह्मण, क्या तू इस विधि को जानता है ?" राम ने कहा, "हाँ, मैं जानता हूँ।" राजा ने कहा, "हे ब्राह्मण, मुझे बता"। राम ने कहा, "राजन्, मैं बताऊँगा।" (२) २९-ऋत्विज् लोग इन भक्ष्य चीज़ों में से किसी एक को ले सकते हैं—सोम, या दही या जल। अगर वे सोम को लेंगे जो ब्राह्मणों का भक्ष है तो तू इस भक्ष के द्वारा ब्राह्मणों को प्रसन्न करेगा। तेरी सन्तान में ब्राह्मत्व आ जायगा। वह दान, सोमपान और भोजन के इच्छुक होंगे और इच्छानुसार