ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 463, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ अध्याय ] ४४९ विचरेंगे । यदि क्षत्रिय में कोई दोष होगा, तो संतान में ब्राह्मणत्व आवेगा । दूसरी या तीसरी पीढ़ी में वह ब्राह्मण जैसा पैदा हो जायगा और वह ब्राह्मण लोगों के साथ रहना पसन्द करेगा । अगर दही लेंगे जो कि वैश्यों का भक्ष्य है तो इससे तू वैश्यों को प्रसन्न करेगा । तेरी सन्तान में वैश्यत्व आयेगा । वे दूसरों को कर देंगे, दूसरे उनको अपनी इच्छानुसार भोगेंगे । यदि उस क्षत्रिय में कोई दोष आ जायगा तो उसकी सन्तान वैश्य होगी और दो या तीन पीढ़ियों में वे पूरे वैश्य हो जायँगे और वैश्यों में रहना पसन्द करेंगे । यदि जल लेंगे जो कि शूद्रों का भक्ष्य है तो तू इस भक्ष्य से शूद्रों को प्रसन्न करेगा । तेरी सन्तान में शूद्रत्व आयेगा । वह दूसरों की सेवा करेंगे और दूसरे उनकी इच्छानुसार ताड़ना करेंगे । यदि क्षत्रिय में कोई दोष आजायगा तो उसकी सन्तान शूद्र होगी, और दो तीन पीढ़ियों में पूरी शूद्र हो जायगी और शूद्रों के साथ रहने लगेगी । (३) ३०—“हे राजन्, यह तीन भक्ष हैं जिनमें से क्षत्रिय को किसी को भी नहीं लेना चाहिये । परन्तु एक भाग उसी का है जिसको उसे लेना चाहिये । न्यग्रोध वृक्ष की नीचे लटकने वाली जड़ें, उदुम्बर, अश्वत्थ और प्लाक्ष के फल । इन का रस निकाल कर पिये । यह उसी का भाग है। जब देवता लोग यज्ञ करके स्वर्ग लोक को गये तो जिस चमसे में सोम था वह टेढ़ा हो गया ( न्युब्जन् ) । उसकी बूँदों के फैलने से न्यग्रोध वृक्ष हो गया, यह न्यग्रोध पहले कुरुक्षेत्र में उपजे थे, अन्य स्थानों पर उन्हीं में से उपज उठे । इस लिये कुरुक्षेत्र में अब तक न्यग्रोध को न्युब्ज कहते हैं । जो नीचे की ओर बढ़े ( रोहन् ) उसको कहेंगे “न्यङ्ग्रोह” । उसी से 'न्यग्रोध' २९