ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 477, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ] ४६३ वेदी के भीतर होते हैं दो बाहर । यह पृथ्वी श्री है । जो वेदी के भीतर है वह उसका परिमित रूप है । और जो वेदी के बाहर है वह अपरिमित रूप है। अब यह जो वेदी के भीतर दो पाये हैं और वेदी के बाहर दो पाये, इनसे वे सब कामनायें पूर्ण होती हैं जो वेदी के भीतर से पूरी होती हैं या वेदी के बाहर से । (१) ६—तख्त को शेर के चमड़े से इस प्रकार ढक देता है कि लोमं ऊपर को रहें और गर्दन पूर्व को । व्याघ्र जंगल के पशुओं में क्षत्र है । राजा भी क्षत्र है । इस प्रकार क्षत्र से क्षत्र की समृद्धि होती है । राजा उस पर बैठने के लिये पीछे से आता है। घुटने टेक कर इस प्रकार बैठता है कि दाहिनी जाँघ ज़मीन से छू जाय और दोनों हाथों से तख्त को पकड़ कर इस मंत्र का पाठ करता है :— “अग्निष्ट्वा गायत्र्या सयुक् छन्दसारोहत्व सवितोष्णिहा सोमोऽनुष्टुभा बृहस्पतिर्बृ॑हत्या मित्रावरुणौ पंक्त्येंद्र॑स्त्रिष्टुभा विश्वेदेवा जगत्या तानह- मनुराज्याय साम्राज्याय भौज्याय स्वाराज्याय वैराज्याय पारमेष्ठ्याय राज्याय माहाराज्यायाधिपत्याय स्वावश्यायातिष्ठायारोहामि ।” “हे तख्त, तुझ पर अग्नि गायत्री छन्द से चढ़े । सविता उष्णिक् से, सोम अनुष्टुभ् से, बृहस्पति बृहत् से, मित्रावरुण पंक्ति से, इन्द्र त्रिष्टुभ् से, विश्वेदेवा जगती से । इनके पीछे मैं चढ़ूं, अनुराज्य, साम्राज्य, भोग, स्वाराज्य, वैराज्य, के लिये और प्रजापति के लोक में जाने के लिये, राज्य के लिये, महा- राज्य के लिये आधिपत्य के लिये, स्वतंत्रता के लिये, और दीर्घ काल तक ठहरने के लिये ।” इस मंत्र को पढ़कर राजा पहले दाहिना घुटना रखता है फिर बायां । ऐसा होता है । यह लोगों का कहना है । देव तख्त रूपी श्री के ऊपर इस प्रकार छंदों से युक्त होकर चढ़े कि अगला अगला छन्द पिछले पिछले छन्द से चार अक्षर