ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 493, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय ] ४७९ ऐसा जानने वाला क्षत्रिय अगर चाहे कि मैं सब को जीत जाऊँ, सब लोक मुझे मिल जायँ, मैं सब राजों में श्रेष्ठ हो जाऊँ, साम्राज्य, भौज्य, स्वाराज्य, वैराज्य, परमेष्ठ्य राज्य, माहाराज्य, आधिपत्य प्राप्त हो जाय, सब भूमि, पूर्ण आयु, मिल जाय और समुद्र तक पृथ्वी का एक मात्र राजा हो जाऊँ तो वह बिना शंका किये श्रद्धा से ऐसी शपथ खाये कि "अगर मैं तेरे साथ द्रोह करूँ तो मुझसे जन्म से मृत्यु तक जो कुछ मैंने सुकृत किया या आयु और प्रजा हुई उसको तू छीन लेना ।" (१) १६—तब ऋत्विज कहे, "चार लकड़ियाँ लाओ, न्यग्रोध की, उदुंबर की, अश्वत्थ की और प्लाक्ष की ।" जो न्यग्रोध है वह वनस्पतियों में क्षत्रिय है। जो न्यग्रोध को लाता है, वह मानों उसमें क्षत्र को धारण कराता है। उदुंबर वनस्पतियों में भौज्य है। जो उदुम्बर लाता है वह उसमें भौज्य धारण कराता है। अश्वत्थ वनस्पतियों में साम्राज्य है। जो अश्वत्थ को लाता है वह उसमें साम्राज्य को धारण कराता है। साक्ष वनस्पतियों में स्वाराज्य और वैराज्य है। जो साक्ष को लाता है वह उसमें स्वाराज्य और वैराज्य धारण कराता है। अब उससे कहे, "चार औषधों (अन्नों) को लाओ, व्रीहि, महाव्रीहि, प्रियंगू, यव ।" व्रीहि ओषधियों में क्षत्रिय है। जो व्रीहि लाता है वह क्षत्रिय में क्षत्र को धारण कराता है। महा- व्रीहि ओषधियों में साम्राज्य है। जो महाव्रीहि को लाता है वह उसमें साम्राज्य को धारण कराता है। प्रियंगू (कांगुनी ओषधियों में भौज्य है। जो प्रियंगू लाता है वह उसमें भौज्य को धारण कराता है। जो यव है वह ओषधियों में सेनानी है। जो यव को लाता है वह उसमें सेना के नेतृत्व को धारण कराता है। (२)