भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 494

४८० [ आठवाँ कण्डिका ७ १८, १९—अब वह उदुम्बर का सिंहासन लाता है जैसा ऊपर की ब्राह्मण में कहा गया। उदुंबर का चमसा लावे या उदुंबर का कोई और बरतन। और उदुम्बर की शाखा भी। इन सब चीजों को (चार तरह के अन्नों को) उदुम्बर के चमसे या पात्र में मिलाते हैं। इसके पश्चात् उस पर दही, शहद, घी और धूप में बरसता हुआ जल डालते हैं। और सिंहासन को सम्बो- धन करके कहते हैं :— बृहत् और रथंतर तेरे दो अगले पाये हैं और वैरूप और वैराज पिछले दो पाये। इत्यादि (देखो पृ० ४७३ से) (१८, १९ वही हैं जो १२, १३, १४ हैं ऊपर देखो)। (३ ४, ५) २०—इस लोक में जो दही है वह मानो इन्द्रिय है। यह जो दही से सींचता है वह क्षत्रिय में इन्द्रिय धारण कराता है। औषध और वनस्पतियों में जो रस है वह शहद है। इसलिये मधु से सींचकर क्षत्रिय में इन के रस को धारण कराता है। यह जो घी है वह पशुओं का तेज है। यह जो घी से सींचता है वह इस प्रकार क्षत्रिय में तेज धारण कराता है। यह जो जल है यह इस लोक में अमृत है। यह जो जल से सींचता है मानो उसमें अमृतत्व धारण कराता है। जिसका अभिषेक हुआ वह अभिषेक करने वाले ब्राह्मण को सोना, हजार गौयें, और चौकोर खेत दे। यह भी कहते हैं कि अपरिमित दक्षिणा दे क्योंकि क्षत्रिय अपरिमित है और अपरिमित दान देने से अपरिमित फल होगा। अब वह राजा के हाथ में सुरा का प्याला देता है और यह मंत्र पढ़ता है :—