ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४८८ [ आठवाँ पञ्चिका बल, राष्ट्र और प्रजा को देने वाली होती हैं। और यही अग्नियाँ यदि पुरोहित द्वारा अर्चित न हों तो प्रसन्न नहीं होतीं और यजमान को स्वर्ग लोक, तथा क्षत्र, बल, राष्ट्र और प्रजा से च्युत कर देती हैं। यह पुरोहित जो वैश्वानर अग्नि है पांच विघ्न कारक शक्तियाँ रखता है, एक उसकी वाणी में और एक पैरों में, एक त्वचा में, एक हृदय में और एक उपस्थ-इन्द्रिय में। इन जलती हुई शक्तियों से वह राजा पर आक्रमण करता है। वाणी में जो विघ्नकारक शक्ति है उसको वह यह कहकर शांत करता है, “भगवन्, आप अब तक कहां रहे। नौकर लोगो, इनके लिये तृण लाओ। यह जो पैरों में विघ्नकारक शक्ति है उसको वह पैर धोने के लिये जल लाकर शांत करते हैं। यह जो उसकी त्वचा में विघ्नकारक शक्ति है उसको वह अलंकारों द्वारा शांत कर रहा है। यह जो उसके हृदय में विघ्नकारक शक्ति है उसको तर्पण करके शांत करता है। यह जो उसकी उपस्थ इन्द्रियों में विघ्नकारक शक्ति है उसको वह घर में स्वच्छन्द निवास कराके शांत करता है। वह इस प्रकार शांततनु और प्रसन्न होकर उस को स्वर्ग को ले जाता है। और क्षत्र, बल, राष्ट्र, और प्रजा से संपन्न करता है। यदि यह शांततनु और प्रसन्न न हो तो स्वर्ग लोक से तथा क्षत्र, बल, राष्ट्र और प्रजा से उसको च्युत कर देता है। (१) २५—यहं जो पुरोहित अग्नि वैश्वानर है, इसमें पांच विघ्नकारक शक्तियाँ होती हैं। जैसे समुद्रभूमि को घेर कर सुरक्षित रखता है इसी प्रकार यह भी राजा को घेर कर सुरक्षित रखता है। जो राजा इस रहस्य को समझकर राष्ट्र के रक्षा करने वाले ब्राह्मण को पुरोहित नियत करता है उसका राष्ट्र सुरक्षित