ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४९० [ आठवीं पञ्चिका जिसके राज में ब्राह्मण की प्रतिष्ठा होती है।” यहाँ ब्राह्मण का अर्थ पुरोहित है। अर्थात् यह पुरोहित का अभिवादन है। (३) २७—उसी ब्राह्मण को पुरोहित बनाना चाहिये जो तीन पुरोहितों और पुरोधाताओं को जानता है। उन तीन पुरोहितों में एक अग्नि है। पृथिवी पुरोधाता (नियुक्त करने वाला) है। दूसरा पुरोहित वाय है। अन्तरिक्ष पुरधाता है। आदित्य पुरोहित है और द्यौ पुरोधाता है। वही पुरोहित है, जो इसको समझता है। जो इसको नहीं समझता वह पुरोहित नहीं है। जिस राजा का ऐसा ब्राह्मण राष्ट्र का रक्षक पुरोहित हो, उसके दूसरे राजा लोग मित्र हो जाते हैं और वह शत्रुओं को जीत लेता है। वह क्षत्र से क्षत्र को और बल से बल को जीतता है। जिस राजा का ऐसा राष्ट्र का रक्षक ब्राह्मण पुरोहित होता है उसकी प्रजा उसको निरंतर और एकमन होकर मानती है। पुरोहित बनाने का मंत्र यह है :— भूर्भुवः स्वरो ममोऽहमस्मि स त्वं स त्वमस्यमोऽहं द्यौरहं पृथिवी। त्वं सामाहमृक्त्वं तावेह संवहावहै पुराण्यस्मान्महाभयात् तनूरसि तन्वं मे पाहि ॥१॥ या ओषधीः सोमराज्ञी र्बंहीः शत विचक्षणाः। ता मह्यमस्मिन्नासने- ऽच्छिद्रं शर्म यच्छत ॥२॥ या ओषधीः सोनराज्ञीर्विष्ठिताः पृथिवीमनु । ता मह्यमस्मिन्नासने- ऽच्छिद्रं शर्म यच्छत ॥३॥ अस्मिन् राष्ट्रे श्रियमावेश याम्यतो देवीः प्रतिपश्याम्यापः। दक्षिणं पादमवनेनिजेऽस्मिन् राष्ट्र इंद्रियं दधामि। सव्यं पादमवनेनिजे- ऽस्मिन् राष्ट्र इंद्रियं वर्धयामि ॥४॥ पूर्वमन्यमपरमन्यं पादाववनेनिजे देवा राष्ट्रस्य गुप्त्या अभयस्या- वरुद्ध्यै । आपः पादावनेजनीर्द्विषंतं निर्दहंतु मे ॥५॥