ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
४९० [ आठवीं पञ्चिका जिसके राज में ब्राह्मण की प्रतिष्ठा होती है।” यहाँ ब्राह्मण का अर्थ पुरोहित है। अर्थात् यह पुरोहित का अभिवादन है। (३) २७—उसी ब्राह्मण को पुरोहित बनाना चाहिये जो तीन पुरोहितों और पुरोधाताओं को जानता है। उन तीन पुरोहितों में एक अग्नि है। पृथिवी पुरोधाता (नियुक्त करने वाला) है। दूसरा पुरोहित वाय है। अन्तरिक्ष पुरधाता है। आदित्य पुरोहित है और द्यौ पुरोधाता है। वही पुरोहित है, जो इसको समझता है। जो इसको नहीं समझता वह पुरोहित नहीं है। जिस राजा का ऐसा ब्राह्मण राष्ट्र का रक्षक पुरोहित हो, उसके दूसरे राजा लोग मित्र हो जाते हैं और वह शत्रुओं को जीत लेता है। वह क्षत्र से क्षत्र को और बल से बल को जीतता है। जिस राजा का ऐसा राष्ट्र का रक्षक ब्राह्मण पुरोहित होता है उसकी प्रजा उसको निरंतर और एकमन होकर मानती है। पुरोहित बनाने का मंत्र यह है :— भूर्भुवः स्वरो ममोऽहमस्मि स त्वं स त्वमस्यमोऽहं द्यौरहं पृथिवी। त्वं सामाहमृक्त्वं तावेह संवहावहै पुराण्यस्मान्महाभयात् तनूरसि तन्वं मे पाहि ॥१॥ या ओषधीः सोमराज्ञी र्बंहीः शत विचक्षणाः। ता मह्यमस्मिन्नासने- ऽच्छिद्रं शर्म यच्छत ॥२॥ या ओषधीः सोनराज्ञीर्विष्ठिताः पृथिवीमनु । ता मह्यमस्मिन्नासने- ऽच्छिद्रं शर्म यच्छत ॥३॥ अस्मिन् राष्ट्रे श्रियमावेश याम्यतो देवीः प्रतिपश्याम्यापः। दक्षिणं पादमवनेनिजेऽस्मिन् राष्ट्र इंद्रियं दधामि। सव्यं पादमवनेनिजे- ऽस्मिन् राष्ट्र इंद्रियं वर्धयामि ॥४॥ पूर्वमन्यमपरमन्यं पादाववनेनिजे देवा राष्ट्रस्य गुप्त्या अभयस्या- वरुद्ध्यै । आपः पादावनेजनीर्द्विषंतं निर्दहंतु मे ॥५॥
पाँचवाँ अध्याय ] ४९१ भूसु॑र्वः स्वः, ओ३म् । वह मैं हूँ, यह त है । तू यह है । मैं वह हूँ । तू द्यौ है, मैं पृथ्वी हूँ । तू साम है, मैं ऋक् हूँ । हम दोनों एक दूसरे को पुष्ट करें । हमको पुराने भयों से बचा ( जिनसे पुराने राजा पीड़ित हो चुके हैं ) । तू शरीर है, मेरे शरीर की रक्षा कर ॥१॥ हे सैकड़ों औषधियो, जो तुम पर सोम राज करता है तुम इस मेरी गद्दी पर मेरे लिये आनन्द दो ॥२॥ हे पृथ्वी पर विस्तृत ओषधियो, जिन तुम पर सोम राज करता है आप मेरी इस गद्दी पर मुझे सुख दो ॥३॥ मैं इस राष्ट्र में शान्ति की स्थापना करता हूँ, इसके लिये मैं दिव्य जलों की ओर देख रहा हूँ । ( पुरोहित के ) दाहिने पैर को धोकर मैं राष्ट्र में इन्द्रिय (इन्द्र की शक्ति) को स्थापित करता हूँ । बायें पैर को धोकर मैं उस इन्द्रिय की वृद्धि करता हूँ ॥४॥ हे देवो, मैं राज्य की रक्षा और अभय की प्राप्ति के लिये ( पुरोहित के ) पहले और दूसरे पगों को धोता हूँ । जिन जलों से पग धोये गये हैं वह मेरे शत्रु को भस्म करें ॥५॥ (४) २८—अब ब्रह्म-परिमर क्रिया कही जाती है । जो ब्रह्म- परिमर क्रिया को जानता है उसके सब शत्रु और वैरी मर जाते हैं । ब्रह्म है जो बहता है अर्थात् वायु । उसके चारों ओर पांच देवता मरते हैं :—विद्युत् , वृष्टि, चंद्रमा, आदित्य, अग्नि । अब पानी नहीं बरसता तो विद्युत् विद्युत् में प्रविष्ट हो जाती है और छिप जाती है । जब लोग शत्रु को न देखें तो राजा कहे, “विद्युत के मरने से मेरे शत्रु भी मर जायँगे, और छिप जायँगे । वे कभी शत्रु को न देखें ।” वह शीघ्र ही मर जाता है और वे उसको देख नहीं पाते । वृष्टि बरस कर चंद्रमा में प्रविष्ट हो जाती है और छिप जाती है । जब वह मर जाती है और अन्तर्ध्यान हो जाती है
४९२ [ आठवीं पञ्चिका तो वे उसे नहीं देखते । जब वे उसे न देखें तो राजा कहे, "वृष्टि के मरने से मेरे शत्रु मर जावें और वे उसको फिर न देख सकें।" वह फौरन मर जाता है और वे उसको नहीं देख सकते । अमावस को चन्द्रमा आदित्य में प्रविष्ट होता है और छिप जाता है। वे उसे देख नहीं सकते क्योंकि वह मर जाता है और छिप जाता है। जब वे उसे न देखें तो राजा कहे, "चन्द्रमा के मरते ही मेरे शत्रु मर जायें और अन्तर्धान हो जायँ । वे उसको न देख सकें।" वे फौरन उस शत्रु को न देखेंगे क्योंकि वह मर जायगा । आदित्य अस्त होकर अग्नि में प्रविष्ट होता है। और छिप जाता है। वे उसको नहीं देख पाते क्योंकि वह मर जाता है और अन्तर्धान हो जाता है। जब वह न दीखे और लोप हो जाय तो राजा कहे, "सूर्य्य के मरने से मेरे शत्रु भी मर जायें और लोप हो जायँ । लोग उसे कभी न देख सकें।" वे फौरन ही उसको न देखेंगे क्योंकि वह मर जायगा । अग्नि बुझ कर वायु में प्रविष्ट होती हैं और अन्तर्धान हो जाती है। वे जब उसको न देखें और वह मर जाय तो राजा कहे, "अग्नि के बुझने से मेरे शत्रु भी मर जायँ और कोई लोग उनको न देख सकें।" बस उसके शत्रु मर जायँगे और कोई उसको न देख सकेगा । अब इन पांचों देवताओं का पुनर्जन्म होता है। वायु से अग्नि का । क्योंकि प्राण रूप बल से मथने से ( रगड़ने ) से अग्नि पैदा होती है। उसको देखकर राजा कहे, "अग्नि फिर उत्पन्न हो, मेरा शत्रु फिर उत्पन्न न हो । वह दूर भाग जाय ।" वह दूर भाग जाता है। अग्नि से आदित्य उत्पन्न होता है। उसको देखकर कहे,
दसवाँ अध्याय ] ४९३ "आदित्य उत्पन्न हो। मेरा शत्रु उत्पन्न न हो। वह दूर भाग जाय।" वह दूर भाग जायगा। आदित्य से चंद्रमा उत्पन्न होता है। उसको देखकर कहे, "चंद्रमा उत्पन्न हो, मेरा शत्रु उत्पन्न न हो। वह दूर भाग जाय।" वह दूर भाग जायगा। चन्द्रमा से वृष्टि होती है। उसको देखकर कहे, 'वृष्टि उत्पन्न हो, मेरा शत्रु उत्पन्न न हो। वह दूर भाग जाय।" वह भाग जायगा। वृष्टि से विद्युत् होता है। उसको देखकर कहे, "विद्युत् उत्पन्न हो, मेरा शत्रु उत्पन्न न हो। वह दूर भाग जाय।" वह दूर भाग जायगा। इसको ब्रह्म-परिमर कहते हैं। इस ब्रह्म-परिमर को कुषारु के बेटे मैत्रेय ने कृषि के लड़के राजा सत्वन् से जो भर्ग गोत्र का था कहा। उसके पांच शत्रु राजा मर गये और वह बड़ा हो गया। यह उसका व्रत है:-"शत्रु के पूर्व न बैठे। जब वह समझ ले कि यह खड़ा हुआ है तब खड़ा हो। अपने शत्रु के लेटने के पहले न लेटे। जब वह समझे कि बैठा है तब बैठे। वह कभी सोवे नहीं जब तक कि शत्रु न सोवे। जब वह समझे कि शत्रु जग पड़ा तो जग पड़े। ऐसा करने से अगर शत्रु अश्म- मूर्धा भी हो अर्थात् उसका पत्थर का भी सिर हो तो भी जल्दी ही वह चूर-चूर हो जायगा।" ऐतरेय ब्राह्मण की आठवीं पञ्चिका का पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ। ऐतरेय ब्राह्मण की आठवीं पञ्चिका समाप्त हुई। ऐतरेय ब्राह्मण सम्पूर्ण समाप्त हुआ।
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ऐतरेय में प्रयुक्त कुछ पारिभाषिक शब्द और व्युत्पत्तियाँ आग्नीध्र—अग्नि रखने का स्थान। अग्नि कुण्ड। अतिजगती—१३-१३-१३-१३ के क्रम से ५२ अक्षरों का छन्द। अध्रिगु—वह व्यक्ति जो पशु को शान्त (चुप) करता है (२।७)। अनद्धा—जो देव, पितर, या मनुष्यों में से किसी को आहुति न दे (७।६)। अनीजान—वह व्यक्ति जिसने यज्ञ अभी नहीं किया। अनुचर—शस्त्र का पिछला भाग। अनुमति—अमावस्या का उत्तरार्ध। अनुष्टुभ्—८-८-८-८ अक्षरों से बने ३२ अक्षर का छन्द। अनुस्तरणी—वह गौ जो मृत यजमान को चिता पर रखने के बाद दान दी जाय (३।३२)। अन्तर्याम—देखो उपांशु। अभ्यावर्त्ति—बारबार आने वाले षडह आदि दिन। अवभृथ—यज्ञ की अन्तिम क्रिया (७।१७)। अविह्रुतपाठ—जिसमें एक मंत्र के पद दूसरे मंत्र के पद से न मिलें। अव्यूह—छन्दों के क्रम टूट जाने को कहते हैं, जैसे प्रातरनुवाक में ( गा-श्र-त्रि-बृ-उ-ज-पं ) ( ४९५ )
( ४९६ ) अश्व—व्युत्पत्ति (५।१) । अहीनसंतति—वह सोम यज्ञ जिसमें कई दिन लगें, और एक दिन और दूसरे दिनों में सिलसिला जारी रहे (६।१७) । आगू—पुरोहित का कहना—होता यक्षत, या, होतर्यज (२।२८) । आग्रन्थन—सादी गाँठ देना (५।१५) । आज्य—देवों के लिए जो घी वह आज्य है । ( देखो घृत ) आयुत—पितरों के लिए घी । ( देखो घृत ) आरम्भणीय—संवत्सर के आरम्भ होने पर किया जाने वाला कृत्य जिसे "चतुर्विंश" भी कहते हैं (४।१२) । आहाव—आहाव, निविद और सूक्त ये आज्यशस्त्र के तीन भाग हैं । होता द्वारा शंसावोम् कहा जाना आहाव है । अध्वर्यु होता के इस कहने पर शस्त्र जो कहे, वह प्रतिगार (२।३३) । आहुति = आहूति—जिसके द्वारा यजमान यज्ञ को बुलावे (१।२) । इष्टि—देव जिसके द्वारा यज्ञ खोजने की इच्छा करें, उसे इष्टि कहते हैं (१।२) । इदादधि—दही से किया जाने वाला ऋतु (३।४०) । ईजान—वह व्यक्ति जिसने पहले यज्ञ किया । उदयनीय इष्टि—यज्ञ की अन्तिम इष्टि । उपगाता-वे व्यक्ति जो सामगान करने वालों के साथ पढ़ते हैं (७।१) । उपनयमनी—लकड़ी का बना दूध पीने का चमसा । उपवसथ—सोमयाग से एक दिन पूर्व पशुबंधन (३।४०) । उपसद्—(१) घेरा, मुहासिरा, (२) कृत्य विशेष । उपसर्ग—( आधिश्रय करना )—पाँच हैं—प्रेचन, प्रचेतय, आयाहि- , पित्रमःस्व, ऋतुश्छन्द शृते वृहत्, सुम्न आधेहि । इसी प्रकार अन्य भी (४।४) । उपस्तरण—यज्ञ में चमचे से घी डालना ।
( ४९७ ) उपांशु—उपांशु और अन्तर्याम दो घड़े होते हैं। इनके ऊपर जो प्याले रक्खे होते हैं, उन्हें उपांशु ग्रह, और अन्तर्याम ग्रह कहते हैं (२।२१)। उष्णिक्—७-७-७-७ अक्षरों से बना २८ अक्षर का छन्द। एकधन = एकधना—वह जल जो यज्ञ के दिन ही प्रातःकाल लाया जाता है। एकाह—एक दिन में पूर्ण होने वाला सोमयज्ञ। किंशारू—चावल की भूसी (२।६) (चावल के अंग—किंशारू, तुषा, कण और कसार)। कुहू—अमावस्या का पूर्वार्ध। खर—प्रवृञ्जन स्थान (यज्ञ पात्र रखने की चबूतरी) (१।२२)। गायत्री—८-८-८ के क्रम से तीन पाद वाले २४ अक्षरों का छन्द। गोष्ठ—जहाँ पशु शाम को बँधते हैं। घृत—देवों का घी आज्य, मनुष्यों का घृत, पितरों का आयुत और गर्भस्थ जीवों का घी नवनीत कहलाता है। पिघला घी आज्य, जमा हुआ घृत, आधा पिघला हुआ आयुत और मक्खन नवनी कहलाता है। चरु या ओदन—उबला चावल, जिसमें दूध और घी भी मिला होता है। चितैध—चिता का ईंधन (४।१०)। जगती—१२-१२-१२-१२ अक्षरों से बने ४८ अक्षरों का छन्द। जातवेद—अग्नि (उत्पन्न हुये को पाया)—व्युत्पत्ति (३।३६)। जुष्टि—रियायती आहुति (१।३०)। ज्योतिष्टोम—सोमयाग का प्रथम विभाग है। इसकी चार संस्थाएँ- अग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी और अतिरात्र हैं। तूष्णींशंस—चुपचाप जाप या प्रार्थना (२।३१)। तृच्—तीन ऋचाओं से मिल कर बने। ३२
( ४९८ ) दीक्षणीय इष्टि—यह केवल यज्ञ की तैयारी या भूमिका है । दूरोहण—स्वर्ग या सूर्य्य । व्युत्पत्ति ( ४।२० ) । त्रिष्टुभ्—११-११-११-११ अक्षरों से बने ४४ अक्षरों का छन्द । द्वादशाह—बारह दिनों का कृत्य ( ४।२३ ) । धाय्य—सामिधेनियों के बीच में पढ़े जाने वाले मंत्र । व्युत्पत्ति देखो ( ३-१८ ) । नभाक—खोदने का कुदाल ( ६।२४ ) । नवनीत—गर्भस्थ जीवों के लिये घी ( देखो घृत ) । निह्नुति—पदों के अन्त के स्वरों की आवृत्ति को कहते हैं ( ५।२ ) । निर्ग्रन्थन—लपेट की गाँठ देना ( ५।१५ ) । निविद्—सोमपान के लिये देवताओं को आवाहन करने वाले ऐसे मंत्र जिनमें देवताओं की स्तुति हो, निविद् कहलाते हैं । ( ३।१० ) । न्यूंख—स्वर को उदात्त कर के पढ़ने की विशेष विधि ( ५।३ ) । न्यून—दस से एक कम=९ ( ६।६ ) । पंक्ति—१०-१०-१०-१० अक्षरों से बने ४० अक्षरों का छन्द । परांचिदिन—अकेले दिन ( ६।१८ ) । पांचजन्य—पांच—देव, मनुष्य, गन्धर्व, अप्सरा, सर्प, पितर ( ३।३१ ) । पुरोगव—नेता ( १।३० ) । पुरोडाश—इष्टियों में दी गई प्रधान हवि जो चावल के आटे को गूँथ कर बनायी जाती है । पहले इसे लकड़ी के टुकड़े पर आह- वनीय अग्नि में पकाते हैं, अन्त में कपालों पर । पुरोरुक्—उच्च स्वर से कहे जाने वाले पद ( तूष्णींशंस का उलटा ) ( २-३६ ) । पृष्ठ—सामवेद के दो तृच् मिल कर पृष्ठ कहलाते हैं ( ३।२१ ) ।
( ४९९ ) प्रग्राह—पाठ की वह विधि जिसमें दो-तीन पदों के बाद ठहरना पड़ता है ( ६।३२ ) । प्रणयन ( अग्नि )—अग्नि को उत्तर वेदी में ले जाना । प्रतिपद्—शस्त्र का पहला भाग । प्रतिष्ठा—पशु ठहराने का स्थान ( ३।२४ ) । प्रपदरीति—ऋचाओं के बीच बीच में अपनी ओर से कुछ पद मिला कर पढ़ने की रीति ( ८।११ ) । प्रस्तर—कुशों का बंडल । प्रातरनुवाक्य—प्रातःकाल बोले जाने वाले अनुवाक्य ( २-१५ ) । प्रायणीय इष्टि—यज्ञ की प्रारम्भिक इष्टि । बृहती—६-६-६-६ अक्षरों से बने ३६ अक्षरों का छन्द । महानाम्नी—व्युत्पत्ति ( ५।७ )—( जिसके द्वारा इन्द्र ने महान् बनाया ) । मानुष—मादुष—जो दोष के योग्य न हो । ( ३।३४ ) । यज्ञदोष—जग्ध, गीर्ण, वात ( ३।४६ ) । यूप—यज्ञशाला का खम्भा जिसमें पशु बाँधते हैं । योनि—बीच में पढ़े जाने वाले मंत्र ( ३।३५ ) । रराटी—दर्भ की माला जो हविर्धान के बीच के खम्मों पर लटकी होती है । राका—पूर्णिमा का पहला भाग ( पूर्वार्द्ध ) । रूपसमृद्ध—वे मंत्र रूप समृद्ध हैं, जिनमें उन मंत्रों से की जाने वाली क्रिया की ओर भी संकेत हो । रोहित—( छन्द )—जिससे स्वर्ग पर चढ़ा जाय । व्युत्पत्ति ( ५।१० ) । वर = देवभजन = यज्ञ स्थान ( १।१३ ) । वषट्कार—तीन प्रकार के वज्र, धामञ्छद्, रिक्त ( ३।७ ) । वसतीवरि—वह जल जो यज्ञ के एक दिन पहले लाया जाता है ।
( ५०० ) वहतु—अतिथियों को भेंट में दी जाने वाली चीज़ें ( ४।७ ) । वह्नि—जो अगुआ हो । व्युत्पत्ति ( ६।१८ ) । बाण—इसके तीन भाग-अनीक, शल्य, और तेजन । वावाता—राजा की बीच की पत्नी ( पहली पत्नी महिषी, दूसरी वावाता, तीसरी परिवृक्ति ) । विहृत पाठ—जिसमें एक मंत्र के पद दूसरे मंत्र के पद से पाठ करते समय मिल जायें ( ४।२ ) । व्यूह—छन्दों के क्रमशः ( ४-४ अक्षर ) बढ़ने को व्यूह कहते हैं । क्रम यह है—गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुभ्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुभ्, जगती ( २।१८ ) । व्यूहछंदस्—तितर बितर हो जाना । शक्वरी—१४-१४-१४-१४ के क्रम से ५६ अक्षरों वाला छन्द । व्युत्पत्ति ( ५।७ ) । शस्त्र—बारह—आज्य, प्रउग, मैत्रावरुण, ब्राह्मणाच्छंसि, अच्छा- वाक्, मरुत्वतीय, निष्केवल्य, मैत्रावरुण, वैश्वदेव, अग्निमारुत आदि ( ३।३६ ) । षडह—६ दिन का कृत्य ( ४।१५ ) । शुक्र = व्याहृति ( ५।३२ ) । संसवदोष—दो या अधिक पुरुषों के एक ही समय में निकट सोम- यज्ञ करने में जो गड़बड़ी होती है वह संसवदोष है । संगविनी—धूप से बचने के लिए जहाँ पशु दोपहर को बाँधे जाते हैं । सदस्—उत्तरवेदी के दक्षिणपूर्वी कोने में स्थान विशेष । संपात—व्युत्पत्ति ( ४।३० ) । समानोदर्क—समान वाक्य पर समात होने वाला सूक्त ( ५।१ ) । साम—न्यायवाला ( व्युत्पत्ति ३।२३ ) । इसके पाँच भाग आहव, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार, निधन ।
( ५०१ ) सामिधेनी—वे मंत्र जिनके द्वारा समिधा अग्नि में छोड़ी जाती हैं । ( अग्नि प्रज्वलित करते समय पढ़े जाने वाले मंत्र ) । सिमा—( सीमा से बाहर जो हुएं ) व्युत्पत्ति ( ५।७ ) । सिनीवाली—पूर्णिमा का दूसरा भाग ( उत्तरार्ध ) । स्वरसाम—व्युत्पत्ति ( ४।१६ ) । हविर्धान—गाड़ी जिस पर सोम या अन्य हवि उत्तर वेदी में लायी जाती है । हविषपंचक—यज्ञ में छोड़ी जाने वाली चीज़ें—धान, करंभ, परिवाप, पुरोडाश, पयस्या ( मट्ठा ) आदि । होता—जो देवताओं का आवाहन करे वह होता ( १।२ ) ।
ऐतिहासिक व्यक्ति अग्नि ४५४ उदमय ४८३, ४८४. अङ्ग ४८३ . उद्दालक आरुणि ४६५ अङ्गिरा २४६, २७६, ३१२, ३६६, उपाविः ७१ ४७४ उशीनर ४७६ अजीगर्त ४३२, ४३३, ४३६, ऋषभ ४३७ ४३७ एकादशाक्ष ३४६ अत्यराति ४८५, ४८६ ऐतरेय १६५, १६८, २१६, २३१ अत्रि ४८३, ४८४ ऐतश मुनि ४०१ अत्रेयि ४११ और्वाण गोत्र ४०१ अम्बाष्ठ्य ४८२ कक्षीवान् ५८, ३१३ अयास्य ४३३ कद्रु ३५७ अरुर्मघ ४४८ कवश (ष) १२३, ४५३, ४८१ अर्बुद ३५७ कश्यप ४४७, ४८२ अवत्सार ऋषि १३२ कुत्स ऋषि १४४ अश्व ३६७ कुरु पांचाल ४७६ अश्वतर ३६७ कुशिक ४३८ अष्टक ४३७ कुशारु ४६३ असितमृग ४४७ कृशानु १६० आराहूल ४४२ कौषीतकि ऋषि ४२४ इलूषा १२३ ऋतुविद् जानकि ४५४ ( ५०२ )
( ५०३ ) गन्धर्वगृहीता कुमारी ३४७ परीक्षित ४४७, ४५३, ४७२, गाधि ४३८ ४८१ गिरिज ४१२ परुच्छेप ३०४, ३०६, ३०६; गृत्समद २८६ ३१०, ३८३ गौरिवीति १८०, ४५८ पर्वत ऋषि ४२८, ४५३, ४८२ च्यवन ४८२ पिजवन ४८२ जनमेजय ४४७, ४५३, ४७२ पुण्ड्र ४३८ जनश्रुति ७१ पुलिन्द ४३८ जमदग्नि ४३३ पैङ्ग्य ऋषि ४२४ जातूकर्ण्य ३४६ पैजवन सुदास ४५४ जानतपि ४८५ प्रासहा १८४, १८५ जानश्रुतेय ३४६ प्रियमेध ४८४ तनूपा, दिव्य, ऋषि १३६, १३७ प्रियव्रत सोमपा ४५३ तपोजा ऋषि १३६, १३७ बभ्रव दैवावृध ४५३ तुरः कावषेय २६५, ४५३, ४८१ बभ्रु ४१२ त्वष्टा ४४८ बुडिल ३६७ दीर्घजिव्ही ( आसुरी ) १३० बृहदुक्थ ४८५ दीर्घतमा ४८४ बेधस राजा ४२८ दुर्मुख पांचाल ४८५ भरत १८०, दौष्यन्त ४८४, ४८५ दुष्यन्त ४८४, ४८५ भरत-ऋषभ ४३७. देवभाग ४१२ भरद्वाज ५७, २२०, ३८० देवरात वैश्वामित्र ४३६, ४३८ भीम वैदर्भ ४५३ नाभानेदिष्ठ ३११ भुवन ४८२ नारद ४२८, ४३०, ४५३, ४८२ भूतवीर ४४७ नग्नजित गांधार ४१३, ४१४ भृगु १२६, ४८२ नोधा ३८० मधुच्छन्दा ४३७, ४३८
( ५०४ ) मनतन्तु ३४६ वृद्धद्युम्न प्रतारिण २१६ मनु ४६४, ४८२ वृषशुष्म ३४६ मनु की प्रजा १४४ शतानीक ४८२ मनु पुत्र नाभानेदिष्ट ३११, ३१२ शबर ४३८ ममता ४८४ शर्यांत २७६, ४८२ मृगयु ४४८ शिल्य ४८६ मैत्रेय ४६३ शुचिवृक्ष गौपालायन २१६ युधांश्रौष्टि ४८२ शुनोलांगूल ४३२ राम मार्गवेय श्यापर्णा ४४८, ४५३ शुनःपुच्छ ४३२ रेणु ४३७ शुनःशेप ४३२, ४३३, ४३५— रोहित ४३०—४३२ ४३६ लांगलायन, मुद्गल का पुत्र २८६ शुष्मिण ४८६ वतघत ३४६ श्यापर्णा ४४७, ४४८, ४५३ वत्स ३६० श्रुतऋषि ४१२ वरु ऋषि ३६१ सत्यकाम जाबाल ४६५ वशिष्ठ ( वसिष्ठ ) ३८०, ४३३, सत्यहव्य ४८५, ४८६ ४५४, ४८२, ४८५, ४८६ सत्रांजित ४८२ वामदेव २७०, ३८० सत्वन् ४६३ वारुणि १६६ सनश्रुत अरिन्दम ४५४ विमद ऋषि ३८३ सर्प ऋषि विमदविरफित २६४ सर्पि ३६० विरोचन ४८४ सवश ४७६ विश्वकर्मा २५७, ४८२ सहदेव ४५३ विश्वंतर ४४७, ४५३ सहदेव सार्जयं ४५३ विश्वरूप ( त्वष्टा का पुत्र ) ४४८ सुक्रीर्ति ३१३ विश्वामित्र ३८०, ३८३, ३८४, सुदास ४८३ ४३३, ४३६, ४३७, ४३८, सुपर्णा ऋषि ३६१
( ५०५ ) सुबल ३६० सोमशुष्मा ४८२ सुयवस ऋषि ४३२, ४३३, ४३६, सौजात ४४२ ४३७ हरिश्चन्द्र ४२८, ४३०, ४३१, सुषद्मा ४४७, ४५३ ४३५ सोमक ४५३ हिरण्यस्तूप १८७ )
मंत्रसूची [ ऐतरेय ब्राह्मण में अधिकांश मन्त्र ऋग्वेद के हैं, पर कुछ मन्त्र अन्य वेदों के भी। इस सूची में यदि किसी वेद का निर्देश नहीं है, तो समझना चाहिए कि मन्त्र ऋग्वेद का है ; शेष स्थलों के लिए अ० = अथर्ववेद, सा० = सामवेद, य० = यजुर्वेद ; आश्व० = आश्वलायन गृह्य सूत्र। मन्त्रों की प्रतीक के आगे कोष्ठक में ऋग्वेद का मण्डल, फिर सूक्त और फिर मन्त्र दिया गया है। अन्य वेदों के संबंध में भी इसी क्रम से काण्ड या अध्याय, सूक्त और मन्त्र दिए हैं। कोष्ठक के बाद इस हिन्दी अनुवाद ग्रन्थ की पृष्ठ संख्या दी गई है। पृष्ठ संख्या के बाद फिर जो कोष्ठक है, उसमें ब्राह्मण की पञ्चिका और सूक्त का निर्देश है। कुछ प्रतीकें मन्त्र की निर्देशक ही नहीं, प्रत्युत उस मन्त्र से आरम्भ होने वाले समस्त सूक्त की निर्देशक हैं। इन प्रतीकों के पूर्व तारक चिह्न (*) लगा है। तीन चार मन्त्रों (त्रिक्) को सूचित करने वाली प्रतीकों के पहले (ϕ) चिह्न है। —सत्य प्रकाश ] अक्रं ददग्निस्तन० ( १०।४५।४) ४१८ ( ७।६ ) अद्यानद्नो न० ( १०।५३।७ ) ४२३ ( ७।६ ) *अगन्म महा० ( ७।१२ ) ३२६ ( ५।२० ) अग्न आ याहि० ( सा० १।१ या ६।१६।१० ) १६, ४१७ ( ७।६ ) अग्न इन्द्रश्च ( ३।२५।४ ) १५० ( २।३७ ) ( ५०६ )
( ५०७ ) अग्निः प्रत्नेन मन्मना० ( ८।४४।१२ ) २४ ( १।४ ) अग्निः शुचित्रततमः० ( ८।४४।२१ ) ४१६ ( ७।७ ) अग्निनाग्निः समिध्यते० ( १।१२।६ ) ४८ ( १।१६ ); ४१७ (७।६) अग्निं दूतं वृणी० ( १।१२।१ ) २० ※अग्निं दूतं वृणी० ( १।१२ ) २७३ ( ४।३१ ) ※अग्निं नरो दीधि० ( ७।१ ) २६५ ( ५।५ ) अग्निं मन्ये पितर० ( १०।७।३ ) २३६ ( ४।७ ) ※अग्नि वो देव० ( ७।३.) ३२१ ( ५।१८ ) अग्निं ऋ॒षिः पव० ( ६।६६।२० ) १४६ ( २।३७ ) अग्निर्नेता भग० ( ३।२०।४ ) १७६ ( ३।१८ ); २८४ ( ५।१ ); २८२ ( ५।४ ); ३०० ( ५।६ ); ३०६ ( ५।१२ ); ३१८ ( ५।१६ ); ३२४ ( ५।१८ ); ३३१ ( ५।२० ) अग्निवृ॑त्राणि जंघनत्० ( ६।१६।३४ ) २४ ( १।४ ); ७० ( १।२५ ) अग्निर्होता गृह० ( ६।१५।१३ ) २३६ ( ४।७ ); ३०३ ( ५।८ ) अग्निर्होता नो० ( ४।१५।१ ) ६८ ( २।५ ) अग्निर्होता न्य० ( ५।१६ ) ४२३ ( ७।६ ) अग्निष्ट्वा गायत्र्या० ४६३ ( ८।६ ) अग्नीषोमाहवि० ( १।६३।७ ) ११० ( २।१० ) अग्ने जुषस्व प्रति० ( १।१४४।७ ) ८३ ( १।३० ) अग्ने नय सुपथा० ( १।१८८।१ ) ३०; ३४ ( १।६' ) अग्ने पत्नीरिहा० ( १।२२।६ ) ३७० ( ६।१० ) अग्ने मरुद्भिः० ( ५।६०।८ ) २०६ ( ३।३८ ) ※अग्ने मृड० ( ४।६ ) ३२८ ( ५।१६ ) अग्नेर्गायत्र्य० ( १०।१३०।४ ) ४६४ ( ८।६ ) अग्नेर्वयं प्रथमस्या० ( १।२४।२ ) ४३३ ( ७।१६ ) अग्ने विश्वेभिः० ( ६।१५।१६ ) ७६ ( १।२८ )
( ५०८ ) अग्ने हंसि न्यत्रिणं० ( १०।११८।१ ) ४७ ( १।१६ ) अग्रं पिबा मधूनां० ( ४।४६।१ ) १३५ ( २।२६ ) अचेति दक्षा व्यु० ( १।१३६।४ ) ३०७ ( ५।१२ ) अजीजनो हि० ( ६।११०।३ ) ४७१ ( ८।११ ) अञ्जन्ति त्वाम० ( ३।८।१ ) ६१ ( २।२ ) अदाम्भ्येन शोचिषाग्ने० ( १०।११८।७ ) ४७ ( १।१६ ) अदितिद्यौरदि० ( १।८६।१० ) १६६ ( ३।३१ ) अद्यानो देव स० ( ५।८२।४ ) २७१ ( ४।२० ); २८६ ( ५।२ ); ३०२ ( ५।८ ); ३२० ( ५।१७ ); ३३४ ( ५।२१ ) अधा यथा नः पितरः० ( ४।२।१६ ) ४१८ ( ७।६ ) अधा होतान्यसी० ( ६।१।२ ) १०५ ( २।१० ) अधि द्वयोर० ( १।८३।३ ) ५५ ( १।१६ ); ७६ ( १।२६ ) अधुक्षत् पिप्यु० ( ८।७२।१६ ) ६२ ( १।२२ ) अध्वर्यवोऽप्र० ( १०।३०।३ ) १२३ अध्वर्यवो भर० ( २।१४।१ } २३२ अध्वर्यवो ह० ( १०।३०।२ ) १२३ #अनश्वो जातो अन० ( ४।३६ ) २८७ ( ५।२ ) अनागसो अदि० ( ५।८२।६ ) २७१ ( ४।३० ) अनु हि त्वा सुतं० ( ६।११०।२ ) ४७१ ( ८।११ ) अन्तश्च प्रागा० ( ८।४८।२ ) ८४ ( १।३० ) अपत्यं वृजिनं० ( ६।५१।१३ ) २६२ ( ५।४ ) अप प्राच इन्द्र० ( १०।१३१।१ ) ३८७ ( ६।२२ ); ४७० ( ८।१० ) अपश्यं गोपा० ( १०।१७७।३ ) ५५ ( १।१६ ) अपश्यं त्वा मनसा चे० ( १०।१८३।१ ) ५७ ( १।२१ ) अपश्यं त्वा मनसा दीध्या० ( १०।१८३।२ ) ५७ ( १।२१ ) अपाः पूर्वेषां हरि० ( १०।९६।१३ ) २३० ( ४।४ ) अपाधमदभि० ( ८।९६।२ ) २७४ ( ४।३१ )
( ५०९ ) अपाम सोमम० ( ८।४८।३ ) ४८१ ( ८।२० ) अपाद्यस्यान्र्ध० ( २।१६।१ ) २३२ ❊अपूर्व्व्या पुरुत० ( ६।३२ ) ३२५ ( ५।१६ ) अपो देवीरुप० ( १।२३।१८ ) १२७ ( २।२० ) अप्सु धूतस्य० ( १०।१०४।२ ) २३२ अप्स्वग्ने सधिष्टव० ( ८।४३।६ ) ४१८ ( ७।७ ) अब्जामुक्थै० ( ७।३४।१६ ) २८३ ( ५।१ ) ❊अभिष्टेव दी० ( ३।३८ ) ३८० ( ६।१८ ); ३८४ ( ६।२० ) अभित्य देव० ( य० ४।२५ ) ३२० ( ५।१३ ) ❊अभि त्य मेषं० ( १।५१ ) ३१६ ( ५।१७ ) अभित्वा देव सवितः० ( १।२४।३ ) ४५ ( १।१६ ); ६१ ( १।२२ ); ३२० ( ५।१७ ); ४३३ ( ७।१६ ) अभित्वा पूर्वपी० ( ८।३।७ ) २६६ ( ४।२६ ); ३२५ ( ५।१८ ) अभित्वा वृषभा० ( ८।४५।२२ ) ४८१ ( ८।२० ) अभित्वा शूर नो० ( ७।३२।२२ ) २३६ ( ४।१० ); २६६ ( ४।२६ ); २८५ ( ५।१ ); ३०१ ( ५।७ ); ३२५ ( ५।१८ ); ३३३ ( ५।२०) अभि प्र भर धृ० ( ८।८६।४ ) २६६ ( ४।२६ ) अभिष्टये सदा० ( ८।६६।५ ) २७३ ( ४।३१ ) ❊अभीवर्त्तेन हविषा० ( १०।१७४ ) ४६६ ( ८।२० ) अभी षु णः सखी० ( सा० १।३।३ ) २१७ अभू दुष रुशत्० ( ५।७५।६ ) १२२ ( २।१८ ); २८३ ( ५।१ ) ❊अभूरेको रयि० ( ६।३१ ) ३१० ( ५।१३ ) अमूर्या उप सूर्ये० ( १।२३।१७ ) १२७ ( २।२० ) अमेत्र नः सुहवा० ( २।३६।३ ) ३७३ ( ६।१२ ) अम्म्रयो यन्त्य० ( १।२३।१६ ) १२७ ( २।२० ) अम्बितमे नदी० ( २।४१।२६ ) २६२ ( ५।४ )