ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय ] ४९३ "आदित्य उत्पन्न हो। मेरा शत्रु उत्पन्न न हो। वह दूर भाग जाय।" वह दूर भाग जायगा। आदित्य से चंद्रमा उत्पन्न होता है। उसको देखकर कहे, "चंद्रमा उत्पन्न हो, मेरा शत्रु उत्पन्न न हो। वह दूर भाग जाय।" वह दूर भाग जायगा। चन्द्रमा से वृष्टि होती है। उसको देखकर कहे, 'वृष्टि उत्पन्न हो, मेरा शत्रु उत्पन्न न हो। वह दूर भाग जाय।" वह भाग जायगा। वृष्टि से विद्युत् होता है। उसको देखकर कहे, "विद्युत् उत्पन्न हो, मेरा शत्रु उत्पन्न न हो। वह दूर भाग जाय।" वह दूर भाग जायगा। इसको ब्रह्म-परिमर कहते हैं। इस ब्रह्म-परिमर को कुषारु के बेटे मैत्रेय ने कृषि के लड़के राजा सत्वन् से जो भर्ग गोत्र का था कहा। उसके पांच शत्रु राजा मर गये और वह बड़ा हो गया। यह उसका व्रत है:-"शत्रु के पूर्व न बैठे। जब वह समझ ले कि यह खड़ा हुआ है तब खड़ा हो। अपने शत्रु के लेटने के पहले न लेटे। जब वह समझे कि बैठा है तब बैठे। वह कभी सोवे नहीं जब तक कि शत्रु न सोवे। जब वह समझे कि शत्रु जग पड़ा तो जग पड़े। ऐसा करने से अगर शत्रु अश्म- मूर्धा भी हो अर्थात् उसका पत्थर का भी सिर हो तो भी जल्दी ही वह चूर-चूर हो जायगा।" ऐतरेय ब्राह्मण की आठवीं पञ्चिका का पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ। ऐतरेय ब्राह्मण की आठवीं पञ्चिका समाप्त हुई। ऐतरेय ब्राह्मण सम्पूर्ण समाप्त हुआ।