भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 506

४९२ [ आठवीं पञ्चिका तो वे उसे नहीं देखते । जब वे उसे न देखें तो राजा कहे, "वृष्टि के मरने से मेरे शत्रु मर जावें और वे उसको फिर न देख सकें।" वह फौरन मर जाता है और वे उसको नहीं देख सकते । अमावस को चन्द्रमा आदित्य में प्रविष्ट होता है और छिप जाता है। वे उसे देख नहीं सकते क्योंकि वह मर जाता है और छिप जाता है। जब वे उसे न देखें तो राजा कहे, "चन्द्रमा के मरते ही मेरे शत्रु मर जायें और अन्तर्धान हो जायँ । वे उसको न देख सकें।" वे फौरन उस शत्रु को न देखेंगे क्योंकि वह मर जायगा । आदित्य अस्त होकर अग्नि में प्रविष्ट होता है। और छिप जाता है। वे उसको नहीं देख पाते क्योंकि वह मर जाता है और अन्तर्धान हो जाता है। जब वह न दीखे और लोप हो जाय तो राजा कहे, "सूर्य्य के मरने से मेरे शत्रु भी मर जायें और लोप हो जायँ । लोग उसे कभी न देख सकें।" वे फौरन ही उसको न देखेंगे क्योंकि वह मर जायगा । अग्नि बुझ कर वायु में प्रविष्ट होती हैं और अन्तर्धान हो जाती है। वे जब उसको न देखें और वह मर जाय तो राजा कहे, "अग्नि के बुझने से मेरे शत्रु भी मर जायँ और कोई लोग उनको न देख सकें।" बस उसके शत्रु मर जायँगे और कोई उसको न देख सकेगा । अब इन पांचों देवताओं का पुनर्जन्म होता है। वायु से अग्नि का । क्योंकि प्राण रूप बल से मथने से ( रगड़ने ) से अग्नि पैदा होती है। उसको देखकर राजा कहे, "अग्नि फिर उत्पन्न हो, मेरा शत्रु फिर उत्पन्न न हो । वह दूर भाग जाय ।" वह दूर भाग जाता है। अग्नि से आदित्य उत्पन्न होता है। उसको देखकर कहे,