ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ] ३६ १३—अब अध्वर्यु होता से कहता है, "खरीदे हुये और लाये हुये सोम के लिये मन्त्र पढ़ो।" वह कहता है—"भद्रादभि- श्रेयः प्रेहि *" अर्थात् "इस लोक से चल कर इससे श्रेष्ठ लोक को जा।" यह लोक भद्र है। इसलिये 'भद्र' से तात्पर्य है इस लोक का। स्वर्ग लोक इस लोक से 'श्रेयः' अर्थात् श्रेष्ठ है। इसके कहने से होता यजमान को परलोक को भेजता है। अब कहता है :— बृहस्पतिः पुर एता तेऽअस्तु । ( मन्त्र का दूसरा पाद ) "बृहस्पति तेरा पथ प्रदर्शक हो" । ब्रह्म ही बृहस्पति है। ब्रह्म को पथ प्रदर्शक बनाने से यज्ञ में विघ्न न होगा । अब कहता है— अथैमवस्य वरऽआ पृथिव्या । ( मन्त्र का तीसरा पाद ) "इसे पृथ्वी के ऊपर ठहराओ" (अथ ईं अवस्य)
- भद्रादभिश्रेयः प्रेहि बृहस्पतिः पुर एता ते अस्तु । अथै मवस्य वर आ पृथिव्या आरे शत्रून् कृणुहि सर्ववीरः ॥ ( तैत्तिरीय संहिता, १।२।३।२ ) भद्रादधि श्रेयः प्रेहि बृहस्पतिः पुर एता ते अस्तु । अथैममस्या वर आ पृथिव्या आरे शत्रुं कृणुहि सर्ववीरम् ॥ ( अथर्व ७।८।१ ) इन दोनों मन्त्रों में थोड़ा सा भेद है। तै० में 'अभि' है। अथर्व० में अधि; तै० में अथैमवस्य ( अथ ईं अवस्य ) है। अथर्व० में 'अथै- ममस्याः' ( अथ इमम् अस्याः ) है । तै० में शत्रून् ( बहुवचन ) है, अथर्व में एक वचन शत्रुं; तै० में सर्ववीरः ( प्रथमा ) है और अथर्व० में सर्ववीरम् ( द्वितीया ) ।