भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 54

४० [ प्रथम पञ्चिका ‘वर’ का अर्थ है देव भजन अर्थात् यज्ञ का स्थान। इस प्रकार वह यज्ञ-स्थान पृथिवी पर सोम को ठहराता है। अब कहता है :— आरे शत्रून् कृणुहि सर्ववीरः। (मन्त्र का तीसरा पाद) “सर्व शक्तिमान् होकर शत्रुओं को भगा”। ऐसा कहने से होता यजमान के साथ अहित करने वाले शत्रु को भगा देता है और उसको सबसे नीचा स्थान दिलाता है। अब वह “सोमा यास्ते मयोभुव” ✤ वाले तीन मन्त्र जो गायत्री छन्द में हैं पढ़ता है। इस प्रकार वह सोम राजा को उसी के देवता और उसी के छन्द द्वारा लाकर प्रसन्न करता है। अब वह (होता) पढ़ता है। सर्वे नंदं ति यशसा गतेन सभासाहेन सख्या सखायः। किल्बिषस्पृत् पितुषणि र्ह्येषामरं हितो भवति वाजिनाय॥ (ऋ० १०।७१।१०) “सब मित्र ऐसे मित्र के आने पर जो सभा में जीत कर यश के साथ आता है प्रसन्न होते हैं। उनकी दोषों से रक्षा करने वाला और अन्न देने वाला और उनकी इन्द्रियों को शक्ति प्रदान करने वाला होता है”। सोम राजा ही “यश” है। इसके मोल लेने पर सभी आनन्द मनाते हैं, वह जिनको यज्ञ में कुछ मिलेगा और वह जिनको न मिलेगा। यह जो सोम राजा है वह ब्राह्मणों का “सभा में जीतने ✤ सोम यास्ते मयोभुव ऊतयः सन्ति दाशुषे। ताभिर्नोऽविताभव॥ इमं यज्ञमिदं वचो जुजुषाण उपागहि। सोम त्वं नो वृधेभव॥ सोम गीर्भिष्ट्वावयं वर्धयामो वचोविदः। सुमृडीको न आविश॥ (ऋ० १।९१।६, १०, ११)