ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ] ४७ यह नौ मंत्र यह हैं :— (१) अग्ने हंसि न्यत्रिणं दीद्यन् मर्त्येष्वा । स्वे क्षये शुचिव्रत ॥ (२) उत्तिष्ठसि स्वाहुतो घृतानि प्रति मोदसे । यत् त्वा स्रुचः समस्थिरन् ॥ (३) सन्नाहुतो विरोचतेऽग्निरीलेन्यो गिरा । स्रुचा प्रतीकमज्यते ॥ (४) घृतेनाग्निः समज्यते मधुप्रतीक आहुतः । रोचमानो विभावसुः ॥ (५) जरमाणः समिध्यसे देवेभ्यो हव्यवाहन । तं त्वा हवन्ते मर्त्याः ॥ (६) तं मर्ता अमर्त्यं घृतेनाग्निं सपर्यत । अदाभ्यं गृहपतिम् ॥ (७) अदाभ्येन शोचिषाग्ने रक्षस्त्वं दह । गोपा ऋतस्य दीदिहि ॥ (८) सत्वमग्ने प्रतीकेन प्रत्योष यातुधान्यः । उरुक्षयेषु दीद्यत् ॥ (६) तं त्वा गीर्भिरुरुक्षया हव्यवाहं समीधिरे । यजिष्ठं मानुषे जने ॥ (ऋ० १०।११८।१-६) यह मंत्र राक्षसों के मारने के लिये पढ़े जाते हैं क्योंकि जब अग्नि उत्पन्न नहीं होता या देर में उत्पन्न होता है तो राक्षस उसे पकड़ लेते हैं । जब एक या दो या अधिक मंत्र पढ़ने पर अग्नि उत्पन्न हो जाय तो उत्पत्ति के योग्य नीचे का मंत्र पढ़ना चाहिये :— उत ब्रुवन्तु जन्तव उदग्निवृत्रहाजनि । धनञ्जयो रणे रणे ॥ (ऋ० १।७४।३) जो यज्ञ का रूप-समृद्ध होता है उसी से यज्ञ सफल होता है । अब यह मंत्र पढ़ता है :— अयं हस्तेन खादि॒नं शिशुं जातं न बिभ्रति । विशामग्निं स्वध्वरम् ॥ (ऋ० ६।१६।४०) मंत्र मे "हस्त" (हाथ) आया है । हाथ से ही तो अग्नि को मथते हैं । 'शिशुं जातं" (पैदा हुआ बच्चा) शब्द आया है । जैसे बच्चा उत्पन्न होता है उसी प्रकार अग्नि उत्पन्न होता है । "न बिभ्रति" इत्यादि में जो 'न' है वह 'ओ३म्' अर्थात् स्वीकारी के अर्थ में है । जैसे देवों के लिये, उसी प्रकार मनुष्यों के लिये ।