ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ४८ [ प्रथम पञ्चिका अब पढ़ता है :— प्र देवं देववीतये भरता वसुवित्तमम् । आ स्वे योनौ निषीदतु ॥ (ऋ० ६।१६।४१) यह मन्त्र उस समय के लिये उपयुक्त है जब अग्नि आहव- नीय कुण्ड में डाला जाता है । “आ स्वे योनौ निषीदतु” (वह अपने घर में बैठे) का तात्पर्य यह है कि आहवनीय अग्नि का उचित स्थान है । आ जातं जात वेदसि प्रियं शिशीतातिथिम् । स्योन आ गृहपतिम् ॥ (ऋ० ६।१६।४२) इस मन्त्र में 'जातं' एक (अर्थात् अग्नि) है और 'जातवेद' दूसरा (अर्थात् आहवनीय) । 'प्रियं शिशीतातिथिम्' से यह जो (मथा हुआ) अग्नि है वह दूसरे अग्नि (अर्थात् आहवनीय) का प्यारा अतिथि है । “स्योन आ गृहपतिम्” से (ऋत्विज् अग्नि) को शान्ति के साथ (आहवनीय) में स्थापित करता है । अग्निनाग्निः समिध्यते कविर्गृहपतिर्युवा । हव्यवाड् जुह्वास्यः ॥ (ऋ० १।१२।६) यह मन्त्र तो यज्ञ का अभिरूप ही है और ठीक है । त्वं ह्यग्ने अग्निना विप्रो विप्रेण सन्सता । सखा सख्या समिध्यसे ॥ (ऋ० ८।४३।१४) इस मन्त्र में एक अग्नि एक विप्र है और दूसरी अग्नि दूसरा विप्र । एक अग्नि एक सत्ता है और दूसरी अग्नि दूसरी सत्ता । 'सखा सख्या समिध्यसे' में एक सखा एक अग्नि है और दूसरा 'सखा दूसरी अग्नि है । तं मर्ज्यन्त सुक्रतुं पुरो यावानमाजिषु । स्वेषु क्षयेषु वाजिनम् ॥ (ऋ० ८।८४।८) इस मन्त्र में 'स्वेषु क्षयेषु' का अर्थात् यह है कि एक अग्नि दूसरी अग्नि का अपना ही घर है । CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.