ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ] ४६ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाक महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः । (ऋ० १।१६४।५०) इस मन्त्र से समाप्त करता है । देवों ने यज्ञ द्वारा ही यज्ञ किया । अग्नि द्वारा ही अग्नि में यज्ञ करके देव स्वर्ग को गये थे । "यह पहले धर्म थे ।" "वे बड़े लोग (महिमानः) उसी स्वर्ग को प्राप्त हो गये जहां पहले साध्य लोग हैं । छन्द ही 'साध्य देव' हैं जिन्होंने पहले अग्नि द्वारा अग्नि में यज्ञ किया । उन्होंने स्वर्ग लोग की प्राप्ति की । वे आदित्य और अंगिरा थे । उन्होंने अग्नि द्वारा अग्नि में यज्ञ किया । वह स्वर्ग लोक को प्राप्त हो गये । यह जो अग्नि की आहुति है वह स्वर्ग में ले जाने वाली आहुति है । यदि यज्ञ करने वाला ठीक ब्राह्मण न हो या दुराचारी हो तो भी यह आहुति देवताओं तक पहुँच जाती है । पापी से मिल कर दूषित नहीं होती । जो इस रहस्य को समझता है उसकी आहुति अवश्य ही देवताओं तक पहुँच जाती है । पापी से मिल कर दूषित नहीं होती । यह तेरह मन्त्र हैं और सभी "रूप समृद्ध" हैं । यज्ञ तभी सफल होता है जब मन्त्र यज्ञ का 'रूप समृद्ध' हो अर्थात् उसमें वही वर्णन हो जैसी क्रिया करनी है । इन तेरह मन्त्रों में पहला और अन्तिम तीन तीन बार बोला जाता है । इस प्रकार यह सत्रह हो जाते हैं । 'प्रजापति' भी सत्रह अंगों वाला है । एक सम्वत्सर या बारह मास और पांच ऋतुयें । प्रजापति ही संवत्सर है । जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजापति सम्बन्धी ऋचाओं द्वारा सफल हो जाता है । पहले और पिछले मन्त्र को तीन तीन बार पढ़ कर वह यज्ञ के आगे और पीछे में गांठ लगा देता है जिससे वह यज्ञ बीच में से फिसल न सके । (५) ४