ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५० [ प्रथम पञ्चिका १७—दोनों आज्य भागों के पुरोनुवाक्य यह हैं :— समिधाग्नि दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम् । आस्मिन् हव्या जुहोतन ॥ (ऋ० ८।४४।१) आ प्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम् । भवा वाजस्य सङ्गथे ॥ (ऋ० १।९१।१६) इन दोनों ऋचाओं में आतिथ्य का वर्णन है। इसलिये यह दोनों रूप-समृद्ध हैं। ऋचा की रूप-समृद्धता यही है कि जो क्रिया करनी हो उसका उसमें विधान हो। पहली 'अतिथि' वाली ऋचा का देवता अग्नि है। दूसरी का देवता सोम है, उसमें 'अतिथि' शब्द नहीं आया। यदि सोम को सम्बोधित करने वाली किसी ऋचा में 'अतिथि' शब्द आता तो उस ऋचा का प्रयोग किया जाता। परन्तु यह ऋचा (ऋ० १।९१।१६) भी अतिथि के ही लिये है क्योंकि इसमें 'आपीन' अर्थात् मोटे होने की ओर संकेत करते हैं। जब अतिथि का सत्कार करते हैं तो मानों उसे मोटा करते हैं। अग्नि और सोम दोनों का याज्य मन्त्र 'जुषाणः' से आरम्भ होता है। अनुवाक्य यह है :— इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूळ्हमस्य पांसुरे ॥ (ऋ० १।२२।१७) और याज्य मन्त्र यह है :— तदस्य प्रियमभि पाथो अश्यां नरो यत्र देवयवो मदन्ति । उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः ॥ (ऋ० १।१५४।५) यह दोनों ऋचायें विष्णु सम्बन्धी हैं। पहली में तीन पद हैं। उसको बोल कर दूसरी के चार पदों को बोलता है। इस प्रकार सात पद हो जाते हैं। आतिथ्य यज्ञ का सिर है। सिर में सात प्राण होते हैं।