भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 67

चौथा अध्याय ] ५३ १९—होता इस मंत्र से आरंभ करता है :— ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद् वि सीमतः सुरुचो वेन आवः। स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसत्श्च विवः ॥ (यजु० १३।३; आश्व० श्रौ० सू० ४।६) ब्रह्म ही वृहस्पति है। ब्रह्म के द्वारा ही इस (प्रवर्ग्य) की चिकित्सा की जाती है। इयं पित्रे राष्ट्र्येत्यग्रे प्रथमायजनुषेभूमनेष्ठाः । तस्मा एतं सुरुचं द्वारमह्यं धर्मे श्रीणंति प्रथमस्यधासेः ॥ (आश्व० श्रौ० सू० ४।६) यह मंत्र पढ़ कर (होता) प्रवर्ग्य में वाणी का धारण करा देता है। क्योंकि राष्ट्री अर्थात् महारानी वाणी है। महान् मही अस्त भायद्द्विजातोद्यां पिता सद्म पार्थिवंचरजः । सबुध्नादाष्ट्रजनुषामभ्युग्रं बृहस्पतिर्देवता तस्य सम्राट् ॥ (आश्व० श्रौ० सू० ४।६) यह ऋचा ब्रह्मणस्पति के प्रति है। ब्रह्म ही वृहस्पति है। ब्रह्म के द्वारा ही इस (प्रवर्ग्य) की चिकित्सा करता है। अभित्यं देवँसवितारमोण्योः कविक्रतुमर्चामि सत्य सवरत्न धाम- म्भिप्रियं मतिं कविं। ऊर्ध्वायास्या मतिर्भा अदि द्युतत् सवीमनि हिरण्य पाणिरमिमीत सुक्रतुः कृपास्वः ॥ (यजु० ४।२५; आश्व० श्रौ० सू० ४।६) यह सविता के प्रति है। प्राण ही सविता है। इस प्रकार इसमें प्राण धारण कराता है। सं सीदस्व मँहाँ असि शोचस्व देववीतमः । वि धूममग्ने अरुषं मियेध्य सृज प्रशस्त दर्शतम् ॥ (ऋ० १।३६।६) इस मंत्र से वह (प्रवर्ग्य को) बिठाते हैं। अञ्जन्ति यं प्रथयन्तो न विप्रा वपावन्तं नाग्निना तपन्तः। पितुर्न पुत्र उपसि प्रेष्ठ आ घर्मो अग्निमृतयन् नसादि ॥ (ऋ० ५।४३।७)