भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 66

चौथा अध्याय प्रवर्ग्य-इष्टि १८—यज्ञ देवतों के पास से यह कह कर चला गया कि मैं तुम्हारा अन्न नहीं बनूँगा। देवों ने कहा, “न जा, तू ही हमारा अन्न होगा।” देवों ने उसको अंग-भंग कर दिया। अंग-भंग किया हुआ यज्ञ उनके लिये प्रभावयुक्त (हितकर) न हुआ। देवों ने कहा, “अंग-भंग किया यज्ञ हमारा अन्न नहीं बन सकता। इस लिये इस यज्ञ को पूर्ण करना चाहिये। उन्होंने उसको पूर्ण किया। जब पूर्ण हो गया तो उन्होंने कहा, “हे अश्विनौ ! तुम दोनों इस यज्ञ को चंगा कर दो। दो अश्विन् देवों के चिकित्सक हैं। अश्विन् देवों के अध्वर्यु हैं। इसलिये दोनों अध्वर्यु ✤ धर्म (अर्थात् प्रवर्ग्य के लिये जो कुछ सामग्री होती है उस) को इकट्ठा कर देते हैं। ऐसा करके वह कहते हैं :— “ब्रह्म, हम प्रवर्ग्य-इष्टि करना चाहते हैं। होता ! तुम स्तुति पढ़ो”। (१) ✤ एक अध्वर्यु और दूसरा प्रति-प्रस्थाता दोनों मिलकर दो अध्वर्यु हुये। ( ५२ )