ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
चौथा अध्याय प्रवर्ग्य-इष्टि १८—यज्ञ देवतों के पास से यह कह कर चला गया कि मैं तुम्हारा अन्न नहीं बनूँगा। देवों ने कहा, “न जा, तू ही हमारा अन्न होगा।” देवों ने उसको अंग-भंग कर दिया। अंग-भंग किया हुआ यज्ञ उनके लिये प्रभावयुक्त (हितकर) न हुआ। देवों ने कहा, “अंग-भंग किया यज्ञ हमारा अन्न नहीं बन सकता। इस लिये इस यज्ञ को पूर्ण करना चाहिये। उन्होंने उसको पूर्ण किया। जब पूर्ण हो गया तो उन्होंने कहा, “हे अश्विनौ ! तुम दोनों इस यज्ञ को चंगा कर दो। दो अश्विन् देवों के चिकित्सक हैं। अश्विन् देवों के अध्वर्यु हैं। इसलिये दोनों अध्वर्यु ✤ धर्म (अर्थात् प्रवर्ग्य के लिये जो कुछ सामग्री होती है उस) को इकट्ठा कर देते हैं। ऐसा करके वह कहते हैं :— “ब्रह्म, हम प्रवर्ग्य-इष्टि करना चाहते हैं। होता ! तुम स्तुति पढ़ो”। (१) ✤ एक अध्वर्यु और दूसरा प्रति-प्रस्थाता दोनों मिलकर दो अध्वर्यु हुये। ( ५२ )
चौथा अध्याय ] ५३ १९—होता इस मंत्र से आरंभ करता है :— ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद् वि सीमतः सुरुचो वेन आवः। स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसत्श्च विवः ॥ (यजु० १३।३; आश्व० श्रौ० सू० ४।६) ब्रह्म ही वृहस्पति है। ब्रह्म के द्वारा ही इस (प्रवर्ग्य) की चिकित्सा की जाती है। इयं पित्रे राष्ट्र्येत्यग्रे प्रथमायजनुषेभूमनेष्ठाः । तस्मा एतं सुरुचं द्वारमह्यं धर्मे श्रीणंति प्रथमस्यधासेः ॥ (आश्व० श्रौ० सू० ४।६) यह मंत्र पढ़ कर (होता) प्रवर्ग्य में वाणी का धारण करा देता है। क्योंकि राष्ट्री अर्थात् महारानी वाणी है। महान् मही अस्त भायद्द्विजातोद्यां पिता सद्म पार्थिवंचरजः । सबुध्नादाष्ट्रजनुषामभ्युग्रं बृहस्पतिर्देवता तस्य सम्राट् ॥ (आश्व० श्रौ० सू० ४।६) यह ऋचा ब्रह्मणस्पति के प्रति है। ब्रह्म ही वृहस्पति है। ब्रह्म के द्वारा ही इस (प्रवर्ग्य) की चिकित्सा करता है। अभित्यं देवँसवितारमोण्योः कविक्रतुमर्चामि सत्य सवरत्न धाम- म्भिप्रियं मतिं कविं। ऊर्ध्वायास्या मतिर्भा अदि द्युतत् सवीमनि हिरण्य पाणिरमिमीत सुक्रतुः कृपास्वः ॥ (यजु० ४।२५; आश्व० श्रौ० सू० ४।६) यह सविता के प्रति है। प्राण ही सविता है। इस प्रकार इसमें प्राण धारण कराता है। सं सीदस्व मँहाँ असि शोचस्व देववीतमः । वि धूममग्ने अरुषं मियेध्य सृज प्रशस्त दर्शतम् ॥ (ऋ० १।३६।६) इस मंत्र से वह (प्रवर्ग्य को) बिठाते हैं। अञ्जन्ति यं प्रथयन्तो न विप्रा वपावन्तं नाग्निना तपन्तः। पितुर्न पुत्र उपसि प्रेष्ठ आ घर्मो अग्निमृतयन् नसादि ॥ (ऋ० ५।४३।७)
५४ [ प्रथम पञ्चिका यह मंत्र घी लगाने के लिये उपयुक्त है। जिसमें रूप-समृद्धता होती है वही मंत्र यज्ञ की क्रिया के लिये अधिक उपयुक्त होता है। पतङ्गमक्तमसुरस्य मायया हृदा पश्यन्ति मनसा विपश्चितः। समुद्रे अन्तः कवयो विचक्षते मरीचीनां पदमिच्छन्ति वेधसः ॥ (ऋ० १०।१७७।१) यो नः सनुत्यो अभिदासदग्ने यो अन्तरो मित्रमहो वनुष्यात्। तम- जरेभिर्वृ'षभिस्तव स्वैस्तपा तपिष्ठ तपसा तपस्वान्। (ऋ० ६।५।४) भवा नो अग्ने सुमना उपेतौ सखेव सख्ये पितरेव साधुः। पुरुद्रुहो हि क्षितयो जनानां प्रति प्रतीचीर्दहतादरातीः। (ऋ० ३।१।२१) इनमें पहली और दूसरी ऋचायें उपयुक्त हैं। जो रूप-समृद्ध है वही यज्ञ में सिद्ध है। नीचे की पाँच ऋचायें राक्षस को मारने के लिये हैं। कृणुष्व पाजः प्रसितिं न पृथ्वीं याहि राजेवामवां इभेन। तृष्वीमनु प्रसितिं द्रूणानोऽस्तासि विध्यरक्षसस्तपिष्ठैः ॥ (ऋ० ४।४।१ तव भ्रमास आशुया पतन्त्यनु स्पृश धृषता शोशुचानः। तपूंष्यग्ने जुह्वा पतङ्गानसंदितो विसृज विष्वगुल्काः ॥ (ऋ० ४।४।२) प्रतिस्पशो विसृज तूर्णितमो भवा पायुर्विशो अस्या अदब्धः। यो नो दूरे अघशंसो यो अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत् ॥ (ऋ० ४।४।३) उदग्नेतिष्ठ प्रत्यातनुष्व न्यमित्राँ ओषतात्तिग्महेते। यो नो अरातिं समिधान चक्रे नीचा तं धक्ष्यतसं न शुष्कम् ॥ (ऋ० ४।४।४) ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याध्यस्मदाविष्कृणुष्व दैव्यान्यग्ने। अव स्थिरा तनुहि यातुजूनां जामिमजामिं प्रमृणीहि शत्रून् ॥ (ऋ० ४।४।५) परि त्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वतः। वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः ॥ (ऋ० १।१०।१२)
चौथा अध्याय ] ५५ अधि द्वयोरदधा उक्थ्यं वचो यतस्रुचा मिथुना या सपर्यतः । असंयत्त व्रते ते क्षेति पुष्यति भद्रा शक्तिर्यजमानाय सुन्वते ॥ (ऋ० १।८३।३) शुक्रं ते अन्यद् यजतं ते अन्यद् विषुरूपे अहनी द्यौरिवासि । विश्वा हि माया अवसि स्वधावो भद्रा ते पूषन्निह रातिरस्तु ॥ (ऋ० ६।५८।१) अपश्यं गोपामनिपद्यमान मा च परा च पथिभिश्चरन्तम् । स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः ॥ (ऋ० १०।१७७।३) यह अकेली चार ऋचायें हैं । सब मिल कर इक्कीस हो जाती हैं । इस पुरुष के भी इक्कीस अंग हैं । १० हाथ की उंगलियां, दस पैर की, और एक आत्मा । इस प्रकार आत्मा को २१ अंग वाला बना देता है । (२) २०—अब नौ पवमानी ऋचायें आती हैं :— ऋध्वे द्रप्सस्य धमतः समस्वरन्नृतस्य योना समरन्त नाभयः । त्रीनत्स मूर्ध्नो असुरश्चक्र आरभे सत्यस्य नावः सुकृतमपीपरन् ॥१॥ सम्यक् सम्यञ्चो महिषा अहेषत सिन्धोरूर्म्यावधि वेना अवीविपन् । मधोर्धारामिर्जनयन्तो अर्कमित् प्रियमिन्द्रस्य तन्वमवीवृधन् ॥२॥ पवित्रवन्तः परि वाचमासते पितैषां प्रत्नो अभिरक्षति व्रतम् । महः समुद्रं वरुणस्तिरोधधे धीरा इच्छेकुरुरुणोन्भारभम् ॥३॥ सहस्र धारेऽव ते समस्वरन् दिवो नाके मधुजिह्वा असश्चतः । अस्य स्पशो न निमिषन्ति भूर्णयः पदेपदे पाशिनः सन्ति सेतवः ॥४॥ पितुर्मातुर्ध्या ये समस्वरन्नृचा शोचन्तः सन्दहन्तो अव्रतान् । इन्द्रद्विष्टामप धमन्ति मायया त्वचमसिक्नीं भूमनो दिवस्परि ॥५॥ प्रत्नान् मानादध्या ये समस्वरञ्छू लोकयन्त्रासो रभसत्य मन्तवः । अपानद्वासो बधिरा अहासत ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः ॥६॥ सहस्र धारे वितते पवित्र आ वाचं पुनन्ति कवयो मनीषिणः । रुद्रास एषामिषिरासो अद्रुहः स्पशः स्वञ्चः सुदृशो नृचक्षसः ॥७॥
५६ [प्रथम पञ्चिका ऋतस्य गोपा न दभाय सुक्रतु स्त्री ष पवित्रा हृद्यन्तरादधे । विद्वांस विश्वा भुवनाभि पश्यत्यवाजुष्टान् विध्यति कर्ते अव्रतान् ॥८॥ ऋतस्य तन्तुर्विततः पवित्र आ जिह्वाया अग्रे वरुणस्य मायया । धीराश्चित्तत् समिनक्षन्त आशताऽत्रा कर्तमव पदात्यप्रभुः ॥६॥ (ऋ० ९।७३।१-६) प्राण नौ हैं। इन नौ ऋचाओं से वह (प्रवर्ग्य में) प्राण स्थापित करता है। अब वह कहता है :— अयं वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने । इममपां सङ्गमे सूर्यस्य शिशुं न विप्रा मतिभी रिहन्ति ॥ (ऋ० १०।१२३।१) ( इस मन्त्र को पढ़ते हुये जब 'अयं' का उच्चारण करता है तब होता अपनी नाभि की ओर संकेत करता है)। 'अयं' नाभि के लिये आया है। क्योंकि कुछ प्राण नाभि के ऊपर "वेनंति" अर्थात् चलते हैं और कुछ नीचे। इसलिये 'वेन' का अर्थ है नाभि। क्योंकि प्राण नाभि से चलते हैं। 'नाभि' का नाभित्व यही है। इस मन्त्र का उच्चारण करके 'होता' 'प्रवर्ग्य' में प्राण-प्रतिष्ठा करता है। अब वह कहता है :— पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः । अतप्त तनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इदद्वहन्तस्तत् समाशत ॥ (ऋ० ९।८३।१) ꕤवियत् पवित्रंधिषणा अतन्वत··· इन मन्त्रों में 'पवित्र' शब्द आया है। इसलिये प्राण पवित्र होते हैं। यह निचले अंग के प्राण हैं। इसलिये इन तीन मन्त्रों को पढ़ कर वह प्रवर्ग्य में वीर्य, मूत्र और पुरीष धारण कराता है। (३)
- ꕤपता नहीं कि यह कहां का मंत्र है। देखो आश्व० श्रौ० ४।६।३ ।
चौथा अध्याय ] ५७. २१—अब वह नीचे के मन्त्र को बोलता है :— गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्। ज्येष्ठ- राजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ॥ (ऋ० २।२३।१) इस मन्त्र का देवता ब्राह्मणस्पति है। ब्रह्म ही बृहस्पति है। ब्रह्म के ही द्वारा उसकी चिकित्सा करता है। नीचे के तीन मन्त्र घर्मतनु हैं :— प्रथश्च यस्य सप्रथश्च नामानुष्टुभस्य हविषो हविर्यत् । धातुद्युँतानात् सवितुश्च विष्णो रथन्तरमा जभारा वसिष्ठः ॥१॥ अविन्दन्ते अतिहितं यदासीद् यज्ञस्य धाम परमं गुहा यत् । धातु- द्युँतानात् सवितुश्च विष्णोर्भरद्वाजो बृहदा चक्रे अग्नेः ॥२॥ तेऽविन्दन् मनसा दीध्याना यज्ञं स्कन्नं प्रथमं देवयानम् । धातु- द्युँतानात् सवितुश्च विष्णोरा सूर्यादभरन् घर्ममेते ॥३॥ (ऋ० १०।१८१।१-३) इनको पढ़कर होता प्रवर्ग्य को शरीर और रूप युक्त कर देता है। पहले मंत्र के चौथे पाद में है "रथन्तरमा जभारा वसिष्ठः" अर्थात् 'वशिष्ठ रथन्तर साम को लाया' और दूसरे मंत्र के चौथे पाद में है:—"भरद्वाजो बृहदाचक्रे अग्नेः" अर्थात् "भरद्वाज ने अग्नि से बृहत् साम बनाया"। इन मंत्रों को पढ़ कर होता प्रवर्ग्य को रथन्तर साम और बृहत् साम से युक्त कर देता है। नीचे के तीन को पढ़ कर जिनका ऋषि प्रजावान् प्राजापत्य है, वह प्रवर्ग्य को सन्तान-युक्त कर देता है :— अपश्यं त्वा मनसा चेकितानं तपसो जातं तपसो विभूतम् । इह प्रजामिह रयिं रराणः प्रजायस्व प्रजया पुत्रकाम ॥१॥ अपश्यं त्वा मनसा दीध्यानां स्वायां तनूऋत्व्ये नाधमानाम् । उप मामुच्चा युवतिर्बभूयाः प्रजायस्व प्रजया पुत्रकामे ॥२॥
५८ [ प्रथम पञ्चिका अहं गर्भमदधामोषधीष्वहं विश्वेषु भुवनेष्वन्तः । अहं प्रजा अजनयं पृथिव्यामहं जनिभ्यो अपरीषु पुत्रान् ॥३॥ (ऋ० १०।१८३।१-३) अब होता भिन्न-भिन्न छन्दों वाले नीचे के नौ मंत्रों को बोलता है :— (१) का राधद् धोत्राश्विना वां को वां जोष उभयोः । कथा विधात्य- प्रचेताः ॥ (२) विद्वांसाविद्दुरः पृच्छेदविद्वानित्थापरो अचेताः । नू चिन्नुमर्ते अक्रौ ॥ (३) ता विद्वांसा हवामहे वां ता नो विद्वांसा मन्म वोचेत मद्य । प्राच॑द् दयमानो युवाकुः ॥ (४) वि पृच्छामि पाक्यान् देवान् वषट्कृतस्याद्भुतस्य दत्तः । पातं च सह्यसो युवं च रभ्यसो नः ॥ (५) प्रया घोषे भृगवाणो न शोभे यया वाचा यजति पज्रियो वाम् । प्रैषयुर्न विद्वान् ॥ (६) श्रुतं गायत्रं तकवानस्याहं चिद्धि रिरेभाश्विना वाम् । आक्षी शुभस्पती दन् ॥ (७) युवं ह्यास्तं महो रन्युवं वा यन्निरततं सतम् । ता नो वसू सुगोपा स्यातं पातं नो वृकादघायोः ॥ (८) मा कस्मै धातमभ्यमित्रिणे नो माकुत्रा नो गृहेभ्यो धेनवो गुः । स्तना- भुजो अशिश्वीः ॥ (६) दुहीयन् मित्रधितये युवाकु राये च नो मिमीतं वाजवत्यै । इषे च 'नो मिमीतं धेनुमत्यै ॥ (ऋ० १।१२०।१-६) यह भिन्न-भिन्न छन्दों के मंत्र इस लिये बोले जाते हैं कि यज्ञ रूपी शरीर के वाह्य अंग (हाथ पैर आदि) भिन्न-भिन्न परिमाण के होते हैं, कोई पतले, कोई मोटे । इसलिये इन मंत्रों का परिमाण भी भिन्न-भिन्न होता है । इन्हीं मंत्रों द्वारा ऋषि कक्षीवान् अश्विनों के प्रिय धाम तक पहुँच गया। और उसने परमलोक को जीत
चौथा अध्याय ] ५९ लिया। जो जो इस रहस्य को समझता है वह अश्विनों के प्रिय धाम तक पहुँच जाता है और परम लोक को जीत लेता है। अब नीचे का सूक्त बोलता है :- .आभात्यग्निरुष सामनीकमुद् विप्राणां देवया वाचो अस्थुः । अर्वाञ्चा नूनं रथ्येह यातं पीपिवांसमश्विना घर्ममच्छ ॥१॥ न संस्कृत्तं प्र मिमीतो गमिष्ठान्ति नूनमपरिवनोऽस्तुतेह । दिवाभि- पित्वेऽ व सागमिष्ठा प्रत्यवर्तिं दाशुषे शं भविष्ठा ॥२॥ उता यातं सङ् गवे प्रातरह्नो मध्यन्दिन उदिता सूर्यस्य । दिवा नक्त- मवसा शन्तमेन नेदानीं पातिरश्विना ततान ॥३॥ इदं हि वां प्रदिवि स्थानमोक इमे गृहा अश्विनेदं दुरोणम् । आ नो दिवो बृहतः पर्वतादद्द्भ्यो यातमभिपमूर्जं वहन्ता ॥४॥ समश्विनोरवसा नूतनेन मयो भुवा सुप्रणीती गमेम । आ नो रयिं वहतमोत वीराना विश्वान्यमृता सौभगानि ।५॥ ( ऋ० ५।७६।१-५ ) पहले मन्त्र के चौथे पाद में "पीपिवांसं अश्विना घर्ममच्छ, यह शब्द यज्ञ के बिल्कुल उपयुक्त हैं। जिनमें रूप-समृद्धता होती है उन्हीं से सफलता होती है। यह त्रिष्टुभ छन्द में हैं। त्रिष्टुभ् वीर्य है। इसलिये इन मन्त्रों के द्वारा प्रवर्ग्य में वीर्य (शक्ति) धारण कराता है। अब वह नीचे का सूक्त पढ़ता है :- ग्रावाणेव तदिदर्थं जरेथे गृधेव वृक्षं निधिमन्तमच्छ । ब्रह्माणेव विदथ उक्थशासा दूतेव हव्या जन्या पुरुत्रा ॥१॥ प्रातर्यावाणा रथ्येव वीराऽजेव यमा वरमा सचेथे । मेने इव तन्वाइ- शुम्भमाने दम्पतीव क्रतुविदा जनेषु ॥२॥ शृङ्गेव नः प्रथमा भन्तमर्वाक् छुफाविव जर्भुराणा तरोभिः । चक्र- वाकेव प्रति वस्तोरुस्रार्वाञ्चा यातं रथ्येव शक्रा ॥३॥ नावेव नः पारयतं युगेव नभ्येव न उपधीव प्रधीव । श्वानेव नो अरिषण्या तद्नूं खगलेव विस्रसः पातमस्मान् ॥४॥
६० [ प्रथम पञ्चिका यातेवाजुर्या नद्येव रीतिरक्षी इव चक्षुषा यातमर्वाक् । हस्ताविव तन्वे३ शम्भविष्ठा पादेव नो नयतं वस्यो अच्छ ॥५॥ ओष्ठाविव मध्वासने वदन्ता स्तनाविच पिप्यतं जीवसे नः। नासेव नस्तन्वो रक्षितारा कर्णाविव सुश्रुता भूतमस्मे ॥६॥ हस्तेव शक्तिमभि सन्ददी नः क्षामेव नः समजतं रजांसि । इमा गिरो अश्विना युष्मयन्तीः क्ष्णोत्रेणेव स्वधितिं सं शिशीतम् ॥७॥ एतानि वामश्विना वर्धनानि ब्रह्म स्तोमं गृत्समदासो अक्रन् । तानि नरा जुजुषाणोपयातं बृहद् वदेम विदथे सुवीराः ॥८॥ (ऋ० २।३९।८) इस सूक्त में आंख, कान, नाक का वर्णन है। इसलिये इस सूक्त को पढ़ कर वह प्रवर्ग्य रूपी यज्ञ-पुरुष में इन्द्रियों को धारण कराता है । यह सूक्त भी त्रिष्टुभ् में हैं। त्रिष्टुभ् वीर्य है। इस प्रकार वह प्रवर्ग्य में वीर्य को धारण कराता है। अब वह इस सूक्त को पढ़ता है :— ईले द्यावा पृथिवी पूर्वचित्तयेऽग्निं घर्मं सुरुचं यामन्निष्टये इति ❋ ॥ (ऋ० म० १, सूक्त ११२) इसमें “अग्निं घर्मं सुरुचं” शब्द आये हैं। इसलिये इनमें रूप-समृद्धता है। जहां रूप-समृद्धता है वहां सफलता है। यह सूक्त जगती छन्द में है। पशु जगती से सम्बन्ध रखते हैं। इसलिये इस सूक्त के पाठ द्वारा वह पशुओं को प्रवर्ग्य में धारण करता है। इस सूक्त में ऐसे शब्द आये हैं जैसे “याभिर- मुमावतं” (दो बार) अर्थात् अश्विन देवों ने यह प्राप्त कराया।‡ इस लिये इस सूक्त के पाठ से वह प्रवर्ग्य रूपी यज्ञ पुरुष को वह सब धारण कराता है जिसको देना अश्विन देवों को ठीक प्रतीत हो। इन मन्त्रों से वह प्रवर्ग्य को समृद्ध करता है। ❋ यह २५ मंत्र हैं। ‡ सम्भवतः १।११२।२३
चौथा अध्याय ] ६१ अब वह इस मन्त्र को पढ़ता है :- अरूरुचदुषसः पृश्निरग्रिय उक्षा बिभर्त्ति भुवनानि वाजयुः। माया- विनो ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमा दधुः ॥ (ऋ० ६।८२।३) इस मंत्र में 'रुच' अर्थात् प्रकाश का वर्णन है। इस लिये इसको पढ़ कर वह प्रवर्ग्य को प्रकाश युक्त करता है। अब वह नीचे के मंत्र से समाप्त करता है :- द्युभिरक्तुभिः परि पातमस्मानरिष्टेभिरश्विना सौभगेभिः । तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः ॥ (ऋ० १।११२।२५) इसमें “अरिष्टेभि.....पृथिवी उत द्यौः" शब्द आये हैं। इनसे वह प्रवर्ग्य के लिये जो कुछ चाहिये उस सब से उसको युक्त कर देता है। यह प्रवर्ग्य के लिये मन्त्रों का पहला भाग हुआ । (४) २२-प्रवर्ग्य के अन्तिम मन्त्र यह हैं :- उप ह्वये सुदुघां धेनुमेतां सुहस्तो गोधुगुत दोहदेनाम् । श्रेष्ठं सवं सविता साविषन्नोऽभीद्धो घर्मस्तदु षु प्र वोचम् ॥ ( ऋ० १।१६४।२६ ) हिङ् कृण्वती वसुपत्नी वसूनां वत्समिच्छन्ती मनसाभ्यागात् । दुहामश्विभ्यां पयो अघ्न्ये सा वर्धतां महते सौभगाय ॥ (ऋ० १।१६४।२७) अभि त्वा देव सवितरीशानं वार्याणाम् । सदावन् भागमीमहे । ( ऋ० १।२४।३ ) समी वत्सं न मातृभिः सृजता गयसाधनम् । देवान्यं मदमभि द्विशवसम् ॥ ( ऋ० ६।१०४।२ ) सं वत्स इव मातृभिरिन्दुहिन्वानो अज्यते । देवावीर्मदो मतिभिः परिष्कृतः ॥ ( ऋ० ६।१०५।२ )
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ६२ [ प्रथम पञ्चिका यत्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि । यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः सरस्वति तमिह धातवे कः ॥ (ऋ० १।१६४।४६) गौरमीमेदनु वत्सं मिषन्तं मूर्धानं हिङ्ङकृणोन् मातवा उ । सृक्वाणं घर्ममभि वावशाना मिमाति मायुं पयते पयोभिः ॥ (ऋ० १।१६४।२८) नमसेदुप सीदत दध्नेदभि श्रीणीतन । इन्दुमिन्द्रे दधातन ॥ (ऋ० ६।११।६) संजानाना उप सीदन्नभिज्ञु पत्नीवन्तो नमस्यं नमस्यन् । रिरिक्वांस- स्तन्यः कृण्वत स्वाः सखा सख्युर्निमिषि रक्षमाणाः ॥ (ऋ० १।७२।५) आ दशभिर्विंवस्वत इन्द्रः कोशमचुच्यवीत् । खेदया त्रिवृता दिवः ॥ (ऋ० ८।७२।८) दुहन्ति सप्तैकामुप द्वा पञ्च सृजतः । तीर्थे सिन्धोरधि स्वरे ॥ (ऋ० ८।७२।७) समिद्धो अग्निरश्विना ततो वां घर्म आगतं । दुह्यते गावोऽधप्रण्ह धेनवोऽदन्नामदंतिकारवः ॥ (आश्व० ४।७) समिद्धो अग्निर्वृषणारतिर्दिवस्ततोघर्मो दुह्यते वामिषेमधु । वयं हि वा पुरूतमासो अश्विना हवामहे सधमादेषु कारवः ॥ (आश्व० ४।७) तदु प्रयक्षतममस्य कर्म दस्मस्य चारुतममस्ति दंसः । उपह्वरे यदुपरा अपिन्वन्मध्वर्णसो नद्यश्चतस्रः ॥ (ऋ० १।६२।६) आत्मन्वन्नभो दुह्यते घृतं पय ऋतस्य नाभिरमृतं विजायते । समीचीनाः सुदानवः प्रीणन्ति तं नरो हितमव मेहन्ति पेरवः ॥ (ऋ० ६।७४।४) उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवयन्तस्त्वेमहे । उप प्र यन्तु मरुतः सुदानव इन्द्र प्राशूर्भवा सचा ॥ (ऋ० १।४०।१) अधुक्षत् पिप्युषीमिषमूर्जं सप्तपदीमरिः । सूर्यस्य सप्तरश्मिभिः ॥ (ऋ० ८।७२।१६)
तीसरा अध्याय ] ६३ उपद्रव पयसा गोधुघोषमाघर्मैरसंचप्रय उस्रियायाः । विन्नांक्रमरव्यत् सविता वरेण्योन्द्राया पृथिवी सुपर्णीतिः। ( आश्व० ४।७ ) आसुते सिञ्चत श्रियं रोदस्योरभिश्रियम्। रसादधीत वृषभम् ॥ ( ऋ० ८।७२।१३ ) आ नूनं खुवर्त्तनिं रथं तिष्ठाथो अश्विना। आ वां स्तोमा इमे मम नभो न चुच्यवीरत ॥ ( ऋ० ८।५।३८ ) समुत्ये महतीरपः संक्षोणी समु सूर्यम् । सं वज्रं पर्वशो दधुः ॥ ( ऋ० ८।७।२२ ) यह इक्कीस ऋचायें यज्ञ की अनुरूप है। जो यज्ञ का अनुरूप होता है वह समृद्ध होता है। होता (सब के पीछे) खड़ा होकर कहता है :— उदु ष्य देवः सविता हिरण्यया बाहू अयंस्त सवनाय सुक्रतुः। घृतेने पाणी अभि प्रुष्णुते मखो युवा सुदक्षो रजसो विधर्मणि ॥ ( ऋ० ६।७१।१ ) आगे जाकर कहता है :— प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता । अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः ॥ ( ऋ० १।४०।३ ) खर※ की ओर देखकर कहता है :— गन्धर्व इत्था पदमस्य रक्षति पाति देवानां जनिमान्यद्भुतः।'गृभ्णाति रिपुं निधया निधापतिः सुकृत्तमा मधुनो भक्षमारात ॥ ( ऋ० ९।८३।४ ) नीचे का मंत्र पढ़ कर बैठ जाता है :— ※ खरः प्रवृञ्जनस्थानम् ( सायण ) Alquadrangular mound of earth for receiving the sacrificial vessels ( यज्ञपात्र रखने की चबूतरी )।
६४ [ प्रथम पञ्चिका नाके सुपर्णमुपपत्तिवांसं गिरो वेनानामकृपन्त पूर्वाः। शिशुं रिहन्ति मतयः पनिप्रतं हिरण्ययं शकुनं द्यामणि स्थाम्॥ (ऋ० ९।८५।११) नीचे के दो मन्त्रों से पूर्वाह्न आहुतियां देता है :- (१) तप्तो वां घर्मो नक्षतु स्व होता प्र वामध्वर्युश्चरतु पयस्वान्। मधोर्दुग्धस्याश्विना तनाया वीतं पातं पयस उस्रियायाः॥ (अथर्व० ७।७३।५) (२) उभा पिबतमश्विनोभा नः शर्म यच्छतम्। अविद्रियाभिरू- तिभिः॥ (ऋ० १।४६।१५) 'अग्नेवीहि' (अग्नि खाओ) इस कृत्य के पश्चात् स्विष्ट- कृत के स्थान में वषट्कार होता है। नीचे के दो मन्त्रों से अपराह्न की आहुतियां देता है :- (१) यदुस्रियास्वाहुतं घृतं पयो यं स वामश्विना भाग आ गतम्। माध्वी धर्तारा विदथस्य सत्पती ततं घर्मं पिबतं रोचने दिवः॥ (अथर्व० ७।७३।४) (२) अस्य पिबत मश्विना युवं मदस्य चारुणः। मध्वो रातस्य धिष्ण्या॥ (ऋ० ८।३५।१४) अब 'अग्नेवीहि' कृत्य और तत्पश्चात् स्विष्टकृत के स्थान में वषट्कार होता है। स्विष्टकृत के लिये हवि में से तीन भाग काटते हैं। अर्थात् सोम के, घर्म के (जो प्रवर्ग्य पात्र में हैं) और 'वाजिन' अर्थात् गर्म मट्ठे के। जब होता इस प्रकार वषट् बोलता है तो स्विष्ट- कृत की कमी पूरी हो जाती है। अब ब्रह्मा इस मन्त्र को जपता है :- विश्वा आशा दक्षिणसद् विश्वान्देवान्यालिह। स्वाहा कृतस्य घर्मस्यमध्वः पिबतमश्विते॥ (आश्व० ४।७) आहुतियों के देने के पश्चात् होता नीचे लिखे सात मंत्रों को पढ़ता है :-
चौथा अध्याय ] ६५ (१) स्वाहाकृतः शुचिर्देवेषु यज्ञो यो अश्विनोश्चमसो देवपानः । तमु विश्वे अमृतासो जुषाणा गन्धर्वस्य प्रत्यास्ना रिहन्ति ॥ (अथर्व० ७।७३।३) (२) समुद्रादूर्मिमुदियर्ति वेनो न भोजाः पृष्ठं हर्यतस्यदर्शि । ऋतस्य सानावधि विष्टपि भ्राट् समानं यो निमभ्यनूषत व्राः ॥ (ऋ० १०।१२३।२) (३) द्रप्सः समुद्रमभि यज्जिगाति पश्यन् गृध्रस्य चक्षसा विधर्मन् । भानुः शुक्रेण शोचिषा चकानस्तृतीये चक्रे रजसि प्रियाणि ॥ (ऋ० १०।१२३।८) (४) सखे सखायमभ्या ववृत् स्वाशुं न चक्रं रथ्येव रंह्यास्मभ्यं दस्म रंह्या । अग्ने मृळीकं वरुणे सचाविदो मरुत्सु विश्वभानुषु तोकाय- तुजे शुशुचान शं कृध्यस्मभ्यं दस्म शं कृधि ॥ (ऋ० ४।१।३) (५) ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता । ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे ॥ (ऋ० १।३६।१३) (६) ऊर्ध्वो नः पाह्यंहसो नि केतुना विश्वं समत्रिणं दह । कृधी न ऊर्ध्वाञ्चरथाय जीवसे विदा देवेषु नो दुवः ॥ (ऋ० १।३६।१४) (७) तं घेमित्था नमस्विन उप स्वराजमासते । अर्धे चिदस्य सुधितं यदेतश आवर्तयन्ति दावने ॥ (ऋ० ८।६६।१७) अब होता नीचे के मंत्र पढ़ कर खाना चाहता है :- पावकशोचे तव हि क्षयं परिहोतर्यज्ञेषु वृक्तबर्हिषो नरः । अग्ने दुव इच्छमानास आप्यमुपासते द्रविणं धेहि तेभ्यः ॥ (ऋ० ३।२।६) खाते हुये कहता है :- "जलती हुई अग्नि में डाली हुई मीठी हवि में से हम खावें । हे देव घर्म ! तू मीठी चीज वाला, अन्न वाला, गर्म-गर्म है । (तुझमें से हम खावें) । तुझे नमस्कार हो । तू मुझे मत सताना" । ५
६६ [ प्रथम पञ्चिका जब प्रवर्ग्य पात्र रख दिया जाता है तो होता नीचे के दो मंत्रों को पढ़ता है :— श्येनो न योनिं सदनं धियाकृतं हिरण्ययमासदं देव एपति । एरिरन्त बर्हिषि प्रियं गिराऽश्वो न देवाँ अप्येति यज्ञियः ॥ (ऋ० ९।७१।६) आस्मिनन्त्सप्तवात्वारोहंतु पूर्व्वारुहः । नृषिहं दीर्घश्रुत्तमं इन्द्रस्य घर्मो अतिथिः ॥ (आश्व० ४।७) दिन के किसी भाग में प्रवर्ग्यपात्र को उठावे, तो यह मन्त्र पढ़ा जाय :— हविर्हविष्मो महि सद्म दैव्यं नभो वसानः परि यात्यध्वरम् । राजा पवित्ररथो वाजमारुहः सहस्र भृष्टिर्जयसि श्रवो बृहत् ॥ (ऋ० ९।८३।५) नीचे के मंत्र से समाप्त करता है :— सूयवसाद् भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम । अद्धि तृणमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती ॥ (ऋ० १।१६४।४०) यह जो घर्म है वह देवों का जोड़ा (स्त्री-पुरुष) है । यह जो घर्म पात्र है वह शिश्न (उपस्थ) है । उसके दो शफ (अर्थात् उठाने के दो लोहे के कड़े) अण्डकोश हैं । उपनयमनी (लकड़ी का बना दूध पीने का चमचा) जंघा हैं । कपाल में जो दूध है वह वीर्य है । यह वीर्य उत्पत्ति के निमित्त अग्नि में डाला जाता है क्योंकि अग्नि इन देवों की योनि है । जो इस रहस्य को समझ कर यज्ञ करता है, वह अग्नि देवयोनि की आहुतियों में से उत्पन्न होता है क्योंकि अग्नि देव-योनि है । और ऋक् युक्त, यजुर्युक्त, सामयुक्त, वेदयुक्त और ब्रह्ममय, अमर हो जाता है । (५) २३—देव और असुर इन लोकों में लड़ने लगे । असुरों ने इन लोकों को गढ़ बना लिया जैसे शक्तिशाली राजा किया करते
चौथा अध्याय ] ६७ हैं । इस (पृथ्वी) को लोहे का दुर्ग बनाया, अन्त- रिक्ष को चाँदी का, द्यौ लोक को सोने का । इस प्रकार इन्होंने इन लोकों को दुर्ग बनाया । देवों ने कहा "इन असुरों ने इन लोकों को दुर्ग बना लिया, अब हमको चाहिये कि इनके मुकाबिले में और लोक बना लें।" ऐसा कह कर उन्होंने मुकाबिले में पृथ्वी से 'सदस्' अर्थात् बैठने का स्थान बनाया । अन्तरिक्ष से "अग्नीध्रम्" अर्थात् अग्नि रखने का स्थान (कुण्ड) बनाया, और द्यौ से दो हविर्धान (हवि रखने के पात्र) बनाये । इस प्रकार उन्होंने इन लोकों के मुकाविले में लोक बनाये । देवों ने कहा, " 'उपसद्' नामक आहुतियाँ दें ।" क्योंकि उपसद् के द्वारा बड़े पुर को जीत लेते हैं ('उपसद्' का अर्थ है 'घेरा' या 'मुहासिरा' जो एक शत्रु किसी नगर को चारों ओर से घेर लेता है) । उन्होंने ऐसा ही किया । जब पहली 'उपसद्' आहुति दी तो उन असुरों को इस पृथ्वी से निकाल दिया । दूसरी आहुति में अन्तरिक्ष से, तीसरी में द्यौलोक से । इस प्रकार उनको इन लोकों से निकाल दिया । यह असुर इन लोकों से निकल कर ऋतुओं में जा घुसे । उन देवताओं ने कहा, "आओ", 'उपसद् नामी आहुतियों को दें ।' यह उपसद् तीन हैं । एक-एक को दो- दो बार पढ़ते हैं । इस प्रकार छः हुये । छः ही ऋतुएँ होती हैं । इस प्रकार उनको उन ऋतुओं में से निकाल दिया । ऋतुओं से निकल कर यह असुर मासों (महीनों) में चले गये । देवों ने कहा, "उपसद् आहुतियां दें ।" इस प्रकार उन्होंने आहुतियां दीं । छः उपसद् थे । एक एक की दो दो बार आहुति दी । बारह हो गईं । बारह ही महीने होते हैं । इस प्रकार बारह महीनों से असुरों को निकाल दिया । असुर महीनों से निकल कर पक्षों (अर्द्ध मास) में चले गये । अब देवों ने कहा "उपसद् आहुतियां दें" । ऐसा ही किया । उपसद् बारह थे । एक एक की दो दो आहुतियां
६८ [ प्रथम पञ्चिका दीं, चौबीस हो गईं। चौबीस ही पाख होते हैं। इस प्रकार उन्होंने पाखों से असुरों को निकाल दिया। पाखों से निकल कर असुर 'रात दिन' में चले गये। देवताओं ने कहा "उपसद् आहुतियां दें"। उन्होंने ऐसा ही किया। जो दोपहर के पहले उपसद् आहुति दी उससे तो असुरों को दिन में से निकाला और जो आहुति दोपहर के बाद दी उससे उनको रात से निकाला। इस प्रकार वह असुर रात और दिन दोनों से निकल गये। तब से पहली उपसद् आहुति पूर्वाह्न में दी जाती है और दूसरी अपराह्न में। ऐसा करने से यज्ञ करने वाला, शत्रु के लिये केवल इतना ही स्थान छोड़ता है जितना दिन और रात के बीच में है। (६) २४—उपसद् जितय अर्थात् विजय के देवता हैं। क्योंकि इन्हीं के द्वारा देवों ने पूर्ण विजय पाई और अपने शत्रुओं को नाश कर दिया। जो इस रहस्य को समझता है वह विजय पाता है और शत्रुओं का नाश करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह इन लोकों, ऋतुओं, महीनों, पाखों और रात-दिनों में देवताओं ने जो जो विजय पाई उस सबको प्राप्त कर लेगा। देव डर गये कि कहीं असुरों को उनके वैमनस्य की सूचना मिल जाय और वह उनका राज्य ले लें। वह दलों में बँट गये और सोचने लगे। अग्नि वसुओं के साथ गया और विचारने लगा। इन्द्र रुद्रों के साथ। वरुण आदित्यों के साथ। बृहस्पति विश्वेदेवों की साथ। वे इस प्रकार दल बना कर सोचने लगे। उन्होंने कहा, "हमारे जो यह प्रियतम शरीर हैं उनको राजा वरुण के घर में रख दें। हममें से जो कोई लोभवश ऐसा न करे वह हमारे साथ न चले।" उन्होंने अपने शरीरों को वरुण राजा के घर में रख दिया। राजा वरुण के घर में अपने शरीरों को रखने का नाम ही
चौथा अध्याय ] ६९ “तानूनप्त्रम्” (शरीरों को जोड़ना) है । इसीलिये कहावत है कि जो कोई 'तानूनप्त्रम्' से युक्त होता है उसे कोई हानि नहीं होती । इस लिये असुर उनके राज्य को नहीं जीत पाये । (७) २५—'आतिथ्य इष्टि' यज्ञ का सिर है, 'उपसद्' गर्दन है । दो कुश बराबर होते हैं क्योंकि सिर और गर्दन बराबर हुआ करते हैं। देवों ने 'उपसद्' से बाण का काम लिया । अग्नि उस बाण का अनीक (अगला भाग) था, सोम लोहे वाला भाग (शल्य), विष्णु नौक (तेजन) और वरुण पर्ण या तीर का पंख । देवों ने आज्य-रूपी इस बाण को छोड़ दिया और इससे असुरों के दुर्गों को तोड़ कर उनमें घुस गये । आज्य आहुति में यही चार देव होते हैं। यजमान पहले (गाय के) चार स्तनों से दूध पीने का कृत्य करता है क्योंकि उपसद्-सम्बन्धी बाण के चार भाग होते हैं, अनीक, शल्य, तेजन और पर्ण । फिर वह तीन थनों से पान करने का कृत्य करता है क्योंकि उपसद्-सम्बन्धी बाण के तीन भाग होते हैं अनीक, शल्य और तेजन । फिर दो थनों का व्रत करता है क्योंकि उपसद् सम्बन्धी बाण में दो भाग हैं अनीक और शल्य । फिर वह एक थन का व्रत करता है क्योंकि उपसद् सम्बन्धी एक ही बाण होता है। एकता से ही तो काम चलता है। कुल ऊपर जो लोक हैं वह विस्तृत हैं । जो नीचे हैं वह सिकुड़े हुए । उतने थनों से आरंभ करता है जो विस्तृत लोकों के सूचक हैं और क्रम से घटता है। इतना इन लोकों के लिये हुआ । (अब पूर्वाह्न और अपराह्न उपसद् कृत्य में सामिधेनियों का वर्णन है) । (१) उपसद्याय मीळ्हुष आस्ये जुहुता हविः । यो नो नेदिष्ठमाप्यम् ॥ (ऋ० ७।१५।१)
७८ [ प्रथम पञ्चिका (२) यः पञ्च चर्षणीरभि निषसाद दमे दमे । कविर्गृहपतिर्युवा ॥ (ऋ० ७।१५।२) (३) स नो वेदो अमात्यमग्नी रक्षतु विश्वतः । उतास्मान् पात्वंहसः ॥ (ऋ० ७।१५।३) (४) इमां मे अग्ने समिधमिमामुपसदं वनेः । इमा उ षु श्रुधी गिरः ॥ (ऋ० २।६।१) (५) अया ते अग्ने विधेमोजो नपादश्वमिष्टे । एना सूक्तेन सुजात । (ऋ० २।६।२) (६) तं त्वा गीर्भिर्गिर्वणसं द्रविणस्युं द्रविणोदः । सपर्यम सपर्यवः ॥ ऋ० २।६ ३) तीन तीन सामिधेनी बोलनी चाहिये (तीन पूर्वाह्न में और तीन अपराह्न में) । यह रूपसमृद्ध है । जब रूपसमृद्धता होती है अर्थात् जो कृत्य करना होता है उसी का उन ऋचाओं में वर्णन होता है तभी यज्ञ सफल होता है । याज्य और अनुवाक्य में यह ऋचायें बोलनी चाहिये जो जघ्निवती हैं। अर्थात् जिनमें 'हन्', 'मारना' धातु का प्रयोग है । यह ये हैं:— (१) अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद् द्रविणस्युर्विपन्यया । समिद्धः शुक्र आहुतः ॥ (ऋ० ६।१६।३४ ) (२) य उग्र इव शर्यहा तिग्मशृंगो न वंशगः । अग्ने पुरो रुरोजिथ । (ऋ० ६।१६।३६ ) (३) त्वं सोमासि सत्पतिस्त्वं राजोत वृत्रहा । त्वं भद्रो असि क्रतुः ॥ ( ऋ० १।६१।५ ) (४) गयस्फानो अमीवहा वसुवित् पुष्टिवर्धनः । सुमित्रः सोम नो भव ॥ ( ऋ० १।६१।१२ ) (५) इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूळहमस्य पांसुरे ॥ (ऋ० १।२२।१७ )
चौथा अध्याय.] ७१ (६) त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धार- यन् ॥ ( ऋ० १।२२।१८ ) ( प्रातःकाल का क्रम यही है अर्थात् पहले तीन याज्य और पिछले तीन अनुवाक्य ) । अपराह्न काल का क्रम पलट जाता है अर्थात् पिछले तीन याज्य और पहले तीन अनुवाक्य । इन्हीं उपसदों द्वारा देवों ने असुरों को जीता और उनके दुर्गों को तोड़ कर उसमें घुस गये । उपसद् मन्त्र एक ही छन्दों में हों, भिन्न-भिन्न छन्दों में नहीं । यदि भिन्न-भिन्न छन्द के होंगे तो राजा का दण्ड यजमान की गर्दन पर होगा । होता रोग को उत्पन्न करने की शक्ति रखता है । इसलिये मन्त्र एक ही छन्द में हों, भिन्न-भिन्न छन्दों में नहीं । जनश्रुति के लड़के उपगविः ने उपसदों के विषय में ब्राह्मण में ऐसा कहा है—“इसी उपसद् के कारण अश्लील (कुरूप) श्रोत्रिय का मुख भरा-भरा लगता है । और वह गाता सा प्रतीत होता है ।” यह उसने इसलिये कहा कि उपसदों में जो आज्य हवि होती है वह गर्दन में और मुख पर रक्खी सी होती है । ( शायद इसका तात्पर्य यह है कि आहुति में दिया हुआ घृत गले और मुख पर असर डालता है—ले० ) । (८) २६—यह जो प्रयाज या अनुयाज हैं वे देवों के कवच हैं । ( उपसद्-इष्टि में ) प्रयाज और अनुयाज नहीं होते जिससे तीर तेज़ हो और पीछे न हटे । ( वेदी और आहवनीय के बीच की सीमा में ) खड़ा होकर होता मन्त्रों को बोलता है जिससे यज्ञ क़ाबू में रहे और चला न जाय । कहते हैं कि सोम राजा के पास घृत छूने का कृत्य (तानूनपत्रम् ) करना क्रूरता है। कारण यह है कि इन्द्र ने घृत के वज्र से ही