ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७८ [ प्रथम पञ्चिका (२) यः पञ्च चर्षणीरभि निषसाद दमे दमे । कविर्गृहपतिर्युवा ॥ (ऋ० ७।१५।२) (३) स नो वेदो अमात्यमग्नी रक्षतु विश्वतः । उतास्मान् पात्वंहसः ॥ (ऋ० ७।१५।३) (४) इमां मे अग्ने समिधमिमामुपसदं वनेः । इमा उ षु श्रुधी गिरः ॥ (ऋ० २।६।१) (५) अया ते अग्ने विधेमोजो नपादश्वमिष्टे । एना सूक्तेन सुजात । (ऋ० २।६।२) (६) तं त्वा गीर्भिर्गिर्वणसं द्रविणस्युं द्रविणोदः । सपर्यम सपर्यवः ॥ ऋ० २।६ ३) तीन तीन सामिधेनी बोलनी चाहिये (तीन पूर्वाह्न में और तीन अपराह्न में) । यह रूपसमृद्ध है । जब रूपसमृद्धता होती है अर्थात् जो कृत्य करना होता है उसी का उन ऋचाओं में वर्णन होता है तभी यज्ञ सफल होता है । याज्य और अनुवाक्य में यह ऋचायें बोलनी चाहिये जो जघ्निवती हैं। अर्थात् जिनमें 'हन्', 'मारना' धातु का प्रयोग है । यह ये हैं:— (१) अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद् द्रविणस्युर्विपन्यया । समिद्धः शुक्र आहुतः ॥ (ऋ० ६।१६।३४ ) (२) य उग्र इव शर्यहा तिग्मशृंगो न वंशगः । अग्ने पुरो रुरोजिथ । (ऋ० ६।१६।३६ ) (३) त्वं सोमासि सत्पतिस्त्वं राजोत वृत्रहा । त्वं भद्रो असि क्रतुः ॥ ( ऋ० १।६१।५ ) (४) गयस्फानो अमीवहा वसुवित् पुष्टिवर्धनः । सुमित्रः सोम नो भव ॥ ( ऋ० १।६१।१२ ) (५) इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूळहमस्य पांसुरे ॥ (ऋ० १।२२।१७ )