भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः ऐतरेयोपनिषद् मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित मनस्तापतमःशान्त्यै यस्य पादनखच्छटा । शरच्चन्द्रनिभा भाति तं वन्दे नीलचिन्मणिम् ॥ शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरा- वीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीते- नाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! मेरी वागिन्द्रिय मनमें स्थित हो और मन वाणीमें स्थित हो [ अर्थात् मेरी वागिन्द्रिय और मन एक-दूसरेके अनुकूल रहें ] । हे स्वप्रकाश परमात्मन् ! तुम मेरे समक्ष आविर्भूत होओ । [ हे वाक् और मन ! ] तुम मेरे प्रति वेदको लाओ । मेरा श्रवण किया हुआ मेरा परित्याग न करे । अपने इस अध्ययनके द्वारा मैं रात और दिनको एक कर दूँ [ अर्थात् मेरा अध्ययन अहर्निश चलता रहे ]। मैं ऋत (वाचिक सत्य) का भाषण करूँ और सत्य ( मनमें निश्चय किया हुआ सत्य ) बोलूँ । वह ब्रह्म मेरी रक्षा करे; वह वक्ताकी रक्षा करे । वह मेरी रक्षा करे और वक्ताकी रक्षा करे—वक्ताकी रक्षा करे । त्रिविध तापकी शान्ति हो ।