भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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प्रथम अध्याय प्रथम खण्ड सम्बन्धभाष्य परिसमाप्तं कर्म सहापरब्रह्म- | यहाँतक अपरब्रह्म (हिरण्यगर्भ) [ग्रन्थस्य] विषयविज्ञानेन । सैषा | विषयक विज्ञान (उपासना) के [प्रयोजनम्] कर्मणो ज्ञानसहितस्य | सहित कर्मका निरूपण समाप्त परा गतिरुक्थविज्ञानद्वारेणोप- | हुआ * । उस ज्ञानसहित कर्मकी संहृता । “एतत्सत्यं ब्रह्म प्राणा- | परा गतिका उक्थविज्ञानके† द्वारा ख्यम्” “एष एको देवः” | उपसंहार किया गया है। [ उस “एतस्यैव प्राणस्य सर्वे देवा | उपसंहारका मूलके वाक्योंद्वारा विभूतयः” “एतस्य प्राणस्या- | प्रदर्शन कराते हैं—] “यह प्राण- त्मभावं गच्छन्देवत। अप्येति” | संज्ञक सत्यब्रह्म है” “यह एक देव इत्युक्तम् । सोऽयं देवताप्पय- | है” “सम्पूर्ण देव इस प्राणकी ही लक्षणः परः पुरुषार्थः, एष | विभूतियाँ हैं।” “इस प्राणके मोक्षः । स चायं यथोक्तेन | तादात्म्यको प्राप्त होकर उपासक | देवतामें लीन हो जाता है”—ऐसा | कहा गया। यह देवतामें लय होना | ही परम पुरुषार्थ है, यही मोक्ष है | और वह यह (देवतालयस्वरूप मोक्ष)

  • ऐतरेय ब्राह्मणान्तर्गत द्वितीय आरण्यकके अध्याय ४, ५ और ६ का नाम ऐतरेयोपनिषद् है। इसमें केवल ब्रह्मविद्याका ही निरूपण किया गया है। इससे पूर्ववर्ती अध्यायोंमें अपर ब्रह्मकी उपासनाके सहित कर्मका वर्णन है। अतः इस वाक्यसे यहाँ उसका परामर्श किया है। † उक्थ प्राणको कहते हैं। अतः ‘वह उक्थ यानी प्राण मैं हूँ’ ऐसी दृढ भावनाके द्वारा उसीमें लय हो जाना ‘उक्थविज्ञान’ है।