ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 13, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३
ज्ञानकर्मसमुच्चयसाधनेन प्राप्तव्यो | इस ज्ञानकर्मसमुच्चयरूप [पूर्वोक्त] साधनसे नातः परमस्तीत्येके प्रतिपन्नाः । | ही प्राप्त होने योग्य है; इससे परे तन्निराचिकीर्षुरुत्तरं केवलात्म- | और कुछ नहीं है—ऐसा कुछ ज्ञानविधानार्थम् 'आत्मा वा | लोग समझते हैं। उन [ समुच्चय- इदम' इत्याद्याह । | वादियोंके मत ] का निराकरण करने- | की इच्छासे श्रुति केवल आत्म- | विज्ञानका विधान करनेके लिये | 'आत्मा वा इदम्' इत्यादि ग्रन्थका | उल्लेख करती है। कथं पुनरकर्मसंबन्धिकेवला- | पूर्व०—परन्तु यह कैसे ज्ञात होता [प्रतिपाद्य-विचारः] त्मविज्ञानविधानार्थ | है कि आगेका ग्रन्थ कर्मके सम्बन्ध- उत्तरो ग्रन्थ इति | से रहित केवल आत्मज्ञानका ही गम्यते ? | विधान करनेके लिये है ? अन्यार्थानवगमात् । तथा च | सिद्धान्ती—क्योंकि इससे [ ब्रह्म- पूर्वोक्तानां देवतानामग्न्यादीनां | ज्ञानके सिवा ] किसी और अर्थका संसारित्वं दर्शयिष्यत्यशनाया- | ज्ञान नहीं होता। इसके सिवा श्रुति दिदोषवत्त्वेन "तमशनापिपा- | "उसे भूख और पिपासासे युक्त कर साभ्यामन्ववार्जत्" (१।२।१) | दिया" इत्यादि वाक्योंसे उन अग्नि इत्यादिना । अशनायादिमत्सर्वं | आदि पूर्वोक्त देवताओंको क्षुधा आदि संसार एव; परस्य तु ब्रह्मणो- | दोषोंसे युक्त दिखलाते हुए उनका ऽशनायाद्यत्ययश्रुतेः । | संसारित्व भी प्रदर्शित करेगी । पर- | ब्रह्म भूख-प्यास आदिसे अतीत है— | ऐसी श्रुति होनेके कारण क्षुधा | आदिसे युक्त तो सब-का-सब संसार | ही है। भवत्वेवं केवलात्मज्ञानं मोक्ष- | पूर्व०—इस प्रकार केवल आत्मज्ञान [समुच्चयवादिन आक्षेपः] साधनं न त्वत्रा- | ही मोक्षका साधन भले ही हो, परन्तु कर्म्येणाधिक्रियते, | उसमें केवल कर्मत्यागी पुरुषका ही | अधिकार नहीं है, क्योंकि इस