ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 14, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ें४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ विशेषाश्रवणात्। अकर्मिण आश्र- | विषयमें कोई विशेष श्रुति नहीं है; | अर्थात् किसी कर्मत्यागी आश्रमान्तर- म्यन्तरस्येहाश्रवणात् । कर्म च | का यहाँ उल्लेख नहीं है । | और बृहतीसहस्र नामक कर्मकी बृहतीसहस्रलक्षणं प्रस्तुत्यानन्तर- | अवतारणाकर उसके अनन्तर ही मेवात्मज्ञानं प्रारभ्यते । तस्मात् | आत्मज्ञानका प्रारम्भ कर दिया है । | अतः इसमें कर्मठ पुरुषका ही कर्म्येवाधिक्रियते । | अधिकार है । न च कर्मासंबन्ध्यात्मविज्ञानं | इसके सिवा आत्मज्ञान कर्मसे पूर्ववदन्त उपसंहारात् । यथा | सर्वथा असम्बद्ध भी नहीं है, क्योंकि | यहाँ भी अन्तमें उसका पहले- कर्मसंबन्धिनः पुरुषस्य सूर्यात्मनः | हीके समान उपसंहार किया गया स्थावरजङ्गमादिसर्वप्राण्यात्मत्व- | है । जिस प्रकार ब्राह्मणमन्त्रने | "सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च¹" इस मुक्तं ब्राह्मणेन मन्त्रेण च "सूर्य | वाक्यद्वारा सूर्यके आत्मभावको प्राप्त आत्मा" (ऋ०सं० १।११५।१) | हुए [ सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती ] कर्म- | सम्बन्धी पुरुषको स्थावरजंगमादि इत्यादिना, तथैव 'एष ब्रह्मैष | सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा बतलाया है इन्द्रः' ( ३।१।३) इत्या- | उसी प्रकार श्रुति 'एष ब्रह्मैष इन्द्रः²' | इत्यादि मन्त्रसे समस्त प्राणियोंके द्युपक्रम्य सर्वप्राण्यात्मत्वम् | आत्मस्वरूपत्वका उपक्रम कर उसका 'यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम्' | 'यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम्³' (३।१।३) इत्युपसंहरिष्यति । | इत्यादि वाक्यद्वारा उपसंहार करेगी। *
१. सूर्य जङ्गम और स्थावरका आत्मा है । २. यह ब्रह्मा है, यह इन्द्र है । ३. जो कुछ स्थावर-जङ्गम है सब प्रज्ञा ( चेतन ) द्वारा प्रवृत्त होनेवाला है ।
- इस प्रकार जैसे पूर्व अध्यायमें कर्मसम्बन्धी उपासनाका विषय होनेसे