ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 15, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 तथा च संहितोपनिषदि | इसी प्रकार संहितोपनिषद्में भी “एतं ह्येव बह्वृचा महत्युक्थे | “इसीको बह्वृच (ऋग्वेदी) बृहती- मीमांसन्ते” ( ऐ० आ० ३।२। | सहस्र नामक सत्रमें विचारते हैं” | इत्यादि श्रुतिसे उसका कर्मसम्बन्धित्व ३।१२) इत्यादिना कर्मसंबन्धि- | प्रतिपादन कर “सम्पूर्ण भूतोंमें त्वमुक्त्वा “सर्वेषु भूतेष्वेवमेव | इसीको ‘ब्रह्म’ ऐसा कहते हैं” इस ब्रह्मेत्याचक्षते” इत्युपसंहरति । | प्रकार उपसंहार किया है । तथा | “जो यह अशरीरी चेतन आत्मा तथा तस्यैव “योऽयमशरीरः | है” इस प्रकार बतलाये हुए उस | आत्माका ही “जो यह सूर्यके प्रज्ञात्मा” इत्युक्तस्य “यश्चासा- | अन्तर्गत है वह एक ही है—ऐसा वादित्य एकमेव तदिति विद्यात्” | जाने” इस वाक्यद्वारा एकत्व प्रति- इत्येकत्वमुक्तम् । इहापि “कोऽय- | पादन किया है । तथा यहाँ (इस | उपनिषद्में) भी “यह आत्मा कौन मात्मा” (३।१।१) इत्युपक्रम्य | है” इस प्रकार उपक्रम कर “प्रज्ञान प्रज्ञात्मत्वमेव “प्रज्ञानं ब्रह्म” (३। | ब्रह्म है” इस वाक्यसे इसका प्रज्ञा- | स्वरूपत्व ही प्रदर्शित करेंगे । अतः १।३) इति दर्शयिष्यति । तस्मा- | आत्मज्ञान कर्मत्यागसे संबन्ध नहीं न्नाकर्मसंबन्ध्यात्मज्ञानम् । | रखता । पुनरुक्त्यानर्थक्यमिति चेत् । | यदि कहो कि पुनरुक्ति होनेके | कारण तो यह प्रकरण व्यर्थ ही है;* कथम् ? “प्राणो वा अहमस्म्यृषे” | किस प्रकार [व्यर्थ है सो बतलाते हैं—] | “हे ऋषे ! मैं निश्चय प्राण ही हूँ” इत्यादिब्राह्मणेन “सूर्य आत्मा” | इत्यादि ब्राह्मणसे तथा “सूर्य आत्मा है” ──────────────────────────────────────────────────────── अन्तमें उपास्यका सर्वात्मत्व प्रतिपादन किया है उसी प्रकार इस अध्यायमें ‘एष ब्रह्मा’ इत्यादि वाक्योंसे बतलाया गया है । अतः जिस प्रकार वह देवता ज्ञानकर्मसम्बन्धी था उसी प्रकार यह आत्मज्ञान भी कर्मसम्बन्धी ही है—ऐसा अनुमान होता है ।
- क्योंकि कर्मका तो पहले ही निरूपण किया जा चुका है ।