ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ इति मन्त्रेण च निर्धारितस्यात्मन इत्यादि मन्त्रद्वारा निश्चित किये आत्माका “यह आत्मा कौन है” "आत्मा वा इदम्" इत्यादि- इस प्रकार प्रश्न करके “[पहले] ब्राह्मणेन “कोऽयमात्मा" (३।१। यह सब आत्मा ही [था]” इस प्रकार निश्चय करना पुनरुक्ति १) इति प्रश्नपूर्वकं पुनर्निर्धारणं और निरर्थक ही है—यदि कोई ऐसा पुनरुक्तमनर्थकमिति चेत्, न; कहे तो उसका यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि उसीके किसी अन्य तस्यैव धर्मान्तरविशेषनिर्धार- विशेष धर्मका निश्चय करनेके लिये णार्थत्वान्न पुनरुक्ततादोषः । होनेसे इसमें पुनरुक्तिका दोष नहीं है। कथम् ? तस्यैव कर्मसंबन्धिनो वह किस प्रकार दोषयुक्त नहीं है [सो बतलाते हैं-] उस कर्मसम्बन्धी जगत्सृष्टिस्थितिसंहारादिधर्मवि- आत्माके ही जगत्की रचना, पालन और संहार आदि विशेष धर्मोंका शेषनिर्धारणार्थत्वात् केवलोपा- निर्धारण करनेके लिये किंवा केवल उसकी उपासनाके [निरूपणके] लिये [ इस प्रकारकी पुनरुक्ति सदोष स्त्यर्थत्वाद्वा । अथवा आत्मे- नहीं है ] । अथवा यों समझो कि त्यादिपरो ग्रन्थसन्दर्भ आत्मनः कर्मका निरूपण करते समय विधान न करनेके कारण कर्मी आत्माकी कर्मिणः कर्मणोऽन्यत्रोपासना- उपासना कर्मको छोड़कर प्राप्त नहीं होती थी; अतः “आत्मा वा प्राप्तौ कर्मप्रस्तावेऽविहितत्वात्के- इदमग्रे” आदि ग्रन्थसमूह यह बतलानेके लिये ही है कि केवल वलोऽप्यात्मोपास्य इत्येवमर्थः । आत्मा भी उपासनीय है । भेद और अभेदरूपसे उपास्य होनेके कारण भेदाभेदोपास्यत्वाद्बैक एवात्मा एक ही आत्मा कर्मके विषयमें