भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७

कर्मविषये भेददृष्टिभाक्, स एवा- | भेददृष्टिसे युक्त है और वही कर्म- कर्मकालेऽभेदेनाप्युपास्य इत्येव- | दृष्टिको छोड़ देनेके समय अभेद- मपुनरुक्तता । | रूपसे भी उपासनीय है—इस प्रकार | यह अपुनरुक्ति ही है । “विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदो- | “जो पुरुष विद्या ( उपासना ) भयꣳ सह। अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा | और अविद्या ( कर्म ) इन दोनोंको | साथ-साथ जानता है वह अविद्यासे विद्ययामृतमश्नुते” ( ई० उ० ११) | मृत्युको पार करके विद्यासे अमरत्व इति, “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजी- | प्राप्त कर लेता है” तथा “इस | लोकमें कर्म करता हुआ ही सौ विषेच्छतꣳ समाः” ( ई० उ० २) | वर्षतक जीवित रहनेकी इच्छा करे” | —ऐसा [ ईशोपनिषद्में ] वाजसनेयी इति च वाजिनाम् । न च वर्ष- | शाखावालोंका कथन है । मनुष्योंकी शतात्परमायुर्मर्त्यानाम् । येन | परमायु भी सौ वर्षसे अधिक नहीं | है, जिससे कि वह कर्मपरित्याग- कर्मपरित्यागेनात्मानमुपासीत । | द्वारा आत्माकी उपासना कर सके। दर्शितं च “तावन्ति पुरुषा- | “पुरुषकी आयुके इतने ( छत्तीस ) युषोऽह्नां सहस्राणि भवन्ति” | ही* सहस्र दिन होते हैं” ऐसा | [ इस ऐतरेयारण्यकमें ही ] दिख- इति । वर्षशतं चायुः कर्मणैव | लाया भी गया है । और वह सौ व्याप्तम् । दर्शितश्च मन्त्रः “कुर्व- | वर्षकी आयु कर्मसे ही व्याप्त है; | इसके लिये “कुर्वन्नेवेह कर्माणि” न्नेवेह कर्माणि” इत्यादिः । | इत्यादि मन्त्र पहले दिखलाया ही है।†

  • ऐतरेय आरण्यकमें छत्तीस-छत्तीस अक्षरके एक सहस्र बृहतीछन्द हैं। अतः उसमें कुल छत्तीस सहस्र अक्षर हुए। इतने ही दिन मनुष्यकी परमायुमें होते हैं। † इससे यह नहीं समझना चाहिये कि दशरथादिके समान जो सौ वर्षसे भी अधिक जीवित रहनेवाले पुरुष हैं वे तो सौ वर्षसे ऊपर जाने- पर कर्मत्याग कर ही सकते हैं । उनके लिये भी आगेकी श्रुतियाँ जीवनपर्यन्त कर्मानुष्ठानकी आवश्यकता बतलाती हैं ।