ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ऽपश्यतः फलादर्शने क्रिया नोप- | न देखनेवाले पुरुषसे कोई क्रिया पद्यते । | नहीं हो सकती । फलादर्शनेऽपि नियुक्तत्वा- | यदि कहो कि फल दिखायी न आत्मदर्शिनो त्करोतीति चेन्न, | देनेपर भी शास्त्राज्ञा होनेके कारण नियोगाविषयत्वम् नियोगाविषयात्म- | वह कर्म करता ही है तो ऐसा दर्शनात् । इष्टयोगमनिष्टवियोगं | कहना उचित नहीं, क्योंकि वह चात्मनः प्रयोजनं पश्यंस्तदुपा- | शास्त्राज्ञाके अविषयभूत आत्माका यार्थी यो भवति स नियोगस्य | दर्शन कर लेता है। जो पुरुष अपना विषयो दृष्टो लोके । न तु त- | इष्टप्राप्ति और अनिष्टपरिहाररूप द्विपरीतनियोगाविषयब्रह्मात्मत्व- | प्रयोजन देखकर उसके उपायका दर्शी । | अर्थी होता है, लोकमें वही [ विधि- ब्रह्मात्मत्वदर्श्यपि संश्चेन्नि- | निषेधरूप ] नियोगका विषय होता युज्येत नियोगाविषयोऽपि सन्न | देखा गया है; उसके विपरीत कश्चिन्न नियुक्त इति सर्वं कर्म | नियोगके अविषयभूत ब्रह्ममें आत्मत्व- सर्वेण सर्वदा कर्तव्यं प्राप्नोति । | का दर्शन करनेवाला पुरुष नियोग- तच्चानिष्टम् । न च स नियोक्तुं | का विषय होता नहीं देखा जाता । शक्यते केनचित् ; आम्ना- | यदि ब्रह्मात्मत्व-दर्शन करनेवाला यस्यापि तत्प्रभवत्वात् । न हि | पुरुष नियोगका अविषय होनेपर | भी शास्त्रसे नियुक्त हो तो कोई | नियुक्त न होनेवाला तो रहा ही | नहीं । इससे यही प्राप्त होता है कि | सबको सर्वदा सम्पूर्ण कर्म करते | रहना चाहिये । किन्तु यह अभीष्ट | नहीं है । वह ( आत्मदर्शी ) तो | किसीसे भी नियोजित नहीं हो | सकता, क्योंकि शास्त्र भी उसीसे | उत्पन्न हुआ है । अपने विज्ञानसे