ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ स्वविज्ञानोत्थेन वचसा स्वयं | उत्पन्न हुए वचनसे ही कोई स्वयं नियुज्यते । नापि बहुवित्स्वा- | नियुक्त नहीं हो सकता और न म्यविवेकिना भृत्येन । | बहुज्ञ स्वामी ही अपने अल्पज्ञ सेवक- | से नियुक्त हो सकता है । आम्नायस्य नित्यत्वे सति | यदि कहो कि नित्य होनेके स्वातन्त्र्यात्सर्वान्प्रति नियोक्तृत्व- | कारण वेदका नियोक्तृत्व-सामर्थ्य सामर्थ्यमिति चेन्न उक्तदोषात् । | स्वतन्त्रतापूर्वक सबके प्रति है; तो तथापि सर्वेण सर्वदा सर्वमविशिष्टं | उपर्युक्त दोषके कारण ऐसा कहना कर्म कर्तव्यमित्युक्तो दोषोऽप्य- | ठीक नहीं । ऐसी अवस्थामें भी परिहार्य एव । | 'सबको सब कर्म अविशेषरूपसे | करने चाहिये'—यह ऊपर बतलाया | हुआ दोष अपरिहार्य ही रहता है। तदपि शास्त्रेणैव विधीयत | यदि कहो कि उसका विधान शास्त्रस्य विरुद्धार्थ- इति चेद् यथा कर्म- | भी शास्त्रने ही किया है अर्थात् बोधकत्वानुपपत्तिः कर्तव्यता शास्त्रेण | जिस प्रकार शास्त्रने कर्मकी कृता तथा तदप्यात्मज्ञानं तस्यैव | कर्तव्यता बतलायी है उसी प्रकार कर्मणः शास्त्रेण विधीयत इति | उस कर्मीके लिये ही उस आत्मज्ञान- चेत्, न; विरुद्धार्थबोधकत्वा- | का भी शास्त्रने ही विधान किया है नुपपत्तेः । न ह्येकस्मिन्कृताकृत- | तो ऐसा कहना भी उचित नहीं, संबन्धित्वं तद्विपरीतत्वं च | क्योंकि उसका विरुद्ध-अर्थ-बोधकत्व बोधयितुं शक्यम्, शीतोष्ण- | सम्भव नहीं है । अग्निकी शीतलता तामिवाग्नेः । | और उष्णताके समान एक ही | शास्त्रमें पाप-पुण्यके सम्बन्धित्व और | उसके विपरीतत्वका बोध कराना— | [ये दोनों विरुद्धधर्म] सम्भव | नहीं हैं।