भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 108 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 21

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११

न चेष्टयोगचिकीर्षा आत्म- | इसके सिवा अपनी इष्टवस्तुके [सिद्धवस्तुनः] नोऽनिष्टवियोगचि- | संयोगकी इच्छा तथा अनिष्ट पदार्थके [शास्त्रबोध्यत्वम्] कीर्षा च शास्त्रकृता, | परित्यागकी अभिलाषा भी शास्त्र- सर्वप्राणिनां तद्दर्शनात् । शास्त्र- | जनित नहीं है, क्योंकि यह सभी कृतं चेत्तदुभयं गोपालादीनां न | प्राणियोंमें [ स्वभावसे ही ] देखी दृश्येत, अशास्त्रज्ञत्वात्तेषाम् । | जाती है । यदि शास्त्रजनित होतीं यद्धि स्वतोऽप्राप्तं तच्छास्त्रेण | तो ये दोनों इच्छाएँ ग्वाले आदिमें बोधयितव्यम् । तच्चेत्कृतकर्तव्य- | दिखायी न देतीं; क्योंकि वे अशास्त्रज्ञ ताविरोध्यात्मज्ञानं शास्त्रेण | होते हैं । जो वस्तु स्वतः प्राप्त नहीं कृतम्, कथं तद्विरुद्धां कर्तव्यतां | होती वही शास्त्रद्वारा बोद्धव्य होती पुनरुत्पादयेच्छीततामिवाग्नौ तम | है । इस प्रकार यदि शास्त्रने कृत इव च भानौ । | और कर्तव्यताके विरोधी आत्मज्ञान- | का उपदेश किया है तो फिर वह | अग्निमें शीतलताके समान तथा | सूर्यमें अन्धकारके समान उसकी | विरुद्ध कर्तव्यताको किस प्रकार | उत्पन्न करेगा ? न बोधयत्येवेति चेन्न, "स | यदि कहो कि वह ऐसा बोध म आत्मेति विद्यात्" (कौ० उ० | कराता ही नहीं है तो ऐसा कथन ३।९)"प्रज्ञानं ब्रह्म"(३।१।३) | भी ठीक नहीं, क्योंकि "वह मेरा इति चोपसंहारात् । "तदात्मा- | आत्मा है-ऐसा जाने" तथा "प्रज्ञान नमेवावेत्" (बृ० उ० १।४। | ही ब्रह्म है" इस प्रकार उपसंहार ९) "तत्त्वमसि" (छा० उ० | किया गया है, तथा "उस (जीव- ६। ८-१६) इत्येवमादिवा- | रूपसे अवस्थित ब्रह्म) ने अपनेको क्यानां तत्परत्वात् । उत्पन्नस्य | ही जाना" "वह तू ही है" | इत्यादि वाक्य भी आत्मज्ञानपरक | ही हैं । उत्पन्न हुआ ब्रह्मात्मविज्ञान