भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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१२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

च ब्रह्मात्मविज्ञानस्याबाध्यमान- | भी बाधित होने योग्य न होनेके त्वान्नानुत्पन्नं भ्रान्तं वेति शक्यं | कारण अनुत्पन्न या भ्रान्तिजनित वक्तुम् । | नहीं कहा जा सकता । त्यागेऽपि प्रयोजनाभावस्य | यदि कहो कि “उसे इस लोकमें [प्रयोजनाभावे] तुल्यत्वमिति चेत् | अकृत ( कर्मत्याग ) से भी कोई [संन्यासस्य] “नाकृतेनेह कश्चन” | प्रयोजन नहीं है” इस स्मृतिके [स्वतःसिद्धत्वम्] (गीता ३ । १८) | अनुसार बोधवान्को त्याग करनेमें | भी प्रयोजनाभावकी समानता ही इति स्मृतेः, य आहुर्विदित्वा | है; अर्थात् जो लोग कहते हैं कि ब्रह्म व्युत्थानमेव कुर्यादिति | ब्रह्मको जानकर व्युत्थान ( कर्म- | त्याग ) ही करना चाहिये उनके तेषामप्येष समानो दोषः प्रयो- | लिये भी यह प्रयोजनाभावरूप दोष जनाभाव इति चेन्न; अक्रिया- | समान ही है, तो उनका यह कथन | ठीक नहीं क्योंकि व्युत्थान तो मात्रत्वाद् व्युत्थानस्य । अविद्या- | अक्रिया ही है * । प्रयोजनका निमित्तो हि प्रयोजनस्य भावो न | भाव तो अविद्याके कारण रहता है। वस्तुधर्मः सर्वप्राणिनां तद्दर्शनात् । | वह वस्तुका धर्म नहीं है क्योंकि | यह बात सभी प्राणियोंमें देखी प्रयोजनतृष्णया च प्रेर्यमाणस्य | जाती है; अर्थात् प्रयोजनकी तृष्णा- वाङ्मनःकायैः प्रवृत्तिदर्शनात् । | से प्रेरित होते हुए प्राणियोंकी वाणी “सोऽकामयत जाया मे स्यात्” | मन और शरीरद्वारा प्रवृत्ति होतो देखी (बृ० उ० १ । ४ । १७) | गयी है तथा वाजसनेयी ब्राह्मणमें | भी “उस ( आदिपुरुष ) ने इच्छा इत्यादिना पुत्रवित्तादि पाङ्क्त- | की कि मेरे पत्नी हो” इत्यादि कथनके लक्षणं काम्यमेवेति “उभे ह्येते | द्वारा “ये दोनों (साध्य-साधनरूप)

  • प्रयोजन तो क्रियाके लिये अपेक्षित होता है; इसलिये अक्रियारूप व्युत्थानके लिये किसी प्रयोजनकी अपेक्षा नहीं है ।