भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३

एषणे एव" (बृ० उ० ३।५।१; | एषणाएँ ही हैं" इस निश्चयके अनुसार ४।४।२२) इति वाजसनेयि- | यही ज्ञात होता है कि पुत्र-वित्तादि ब्राह्मणेऽवधारणात् । | पाङ्कलक्षण* कर्म काम्य ही है। अविद्याकामदोषनिमित्ताया | अतः विद्वान्के अविद्या आदि दोषोंका अभाव हो जानेके कारण वाङ्मनःकायप्रवृत्तेः पाङ्कलक्ष- | अविद्या एवं कामनारूप दोषसे णाया विदुषोऽविद्यादिदोषाभा- | होनेवाली मन, वाणी और शरीरकी पाङ्क्तरूपा प्रवृत्ति उपपन्न नहीं वादनुपपत्तेः क्रियाभावमात्रं | है; इसलिये व्युत्थान क्रिया- का अभावमात्र है, वह यागादि- व्युत्थानम्, न तु यागादिवदनु- | के समान अनुष्ठेयरूप और भावा- ष्ठेयरूपं भावात्मकम् । तच्च | त्मक नहीं है। वह तो विद्यावान् पुरुषका धर्म ही है; अतः उसके विद्यावत्पुरुषधर्म इति न प्रयो- | लिये किसी प्रयोजनका अन्वेषण करनेकी आवश्यकता नहीं है। जनमन्वेष्टव्यम् । न हि तमसि | अन्धकारमें प्रवृत्त होनेवाला पुरुष यदि प्रकाशके उदित होनेपर गड्ढे, प्रवृत्तस्योदित आलोके यद्गर्त- | कीचड़ और काँटे आदिमें नहीं पङ्ककण्टकाद्यपतनं तत्किंप्रयो- | गिरता तो 'इस (उसके न गिरने) का क्या प्रयोजन है?' ऐसा प्रश्न जनमिति प्रहार्हम् । | नहीं किया जा सकता । व्युत्थानं तर्ह्यर्थप्राप्तत्वान्न | तब तो स्वभावतः प्राप्त होनेके कामाभावे चोदनार्हमिति गा- | कारण व्युत्थान चोदना (विधिवाक्य) आत्मज्ञस्यापि र्हस्थ्ये चेत्परं ब्रह्म- | का विषय नहीं है। इसपर यदि गार्हस्यानुपपत्तिः विज्ञानं जातं तन्नै- | कहो कि यदि किसीको गृहस्थाश्रममें ही परब्रह्मका ज्ञान हो जाय तो उसे

  • पंक्ति छन्द पाँच अक्षरका होता है। उससे सदृशता होनेके कारण जिस कर्ममें पत्नी, पुत्र, दैववित्त, मानुषवित्त और कर्म इन पाँच साधनोंका योग होता है वह पांक्त कर्म कहलाता है।