ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 27, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७ ════════════════════════════════════════════════════════════
[मूल संस्कृत] अर्थप्राप्तस्य व्युत्थानस्य पुनर्वि- चनाद्विदुषः कर्तव्यत्वोपपत्तिः । अविदुषापि मुमुक्षुणा पारि- [पार्श्व-टिप्पणी: विविदिषा-संन्यासविधानम्] व्राज्यं कर्तव्यमेव । तथा च “शान्तो दान्तः०” ( बृ० उ० ४ । ४ । २३) इत्यादिवचनं प्रमाणम् । शमदमादीनां चात्मदर्शनसाध- नानामन्याश्रमेष्वनुपपत्तेः । “अ- त्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं प्रोवाच सम्यगृषिसङ्घजुष्टम्” ( ६ । २१) इति च श्वेताश्वतरे विज्ञायते । “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः” ( कैवल्य० २) इति च कैवल्यश्रुतिः । “ज्ञात्वा नैष्कर्म्यमाचरेत्” इति च स्मृतेः। “ब्रह्माश्रमपदे वसेत्” इति च
[भाष्यार्थ] और स्वभावतः प्राप्त व्युत्थानका [“व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति” आदि वाक्योंसे] पुनः विधान किया गया है, इसलिये विद्वान् मुमुक्षुके लिये उसकी कर्तव्यता उचित ही है। जिस मुमुक्षुको ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है उसे भी संन्यास करना ही चाहिये। इस विषयमें “शान्तो दान्त उपरत- स्तितिक्षुः” आदि वचन प्रमाण हैं । तथा आत्मदर्शनके साधन शम- दमादिका अन्य आश्रमोंमें होना सम्भव भी नहीं है, जैसा कि “मन्त्रद्रष्टा ऋषियोंद्वारा भलीप्रकार सेवित उस परम पवित्र तत्त्वका परमहंसोंको उपदेश किया” इत्यादि मन्त्रोंसे श्वेताश्वतरोपनिषद्में बतलाया गया है, तथा “कर्मसे, प्रजासे अथवा धनसे नहीं बल्कि त्यागसे ही किन्हीं- किन्हींने अमरत्व प्राप्त किया है” ऐसी कैवल्योपनिषद्की श्रुति भी है । और “ज्ञान प्राप्तकर नैष्कर्म्यका आचरण करे” इस स्मृतिसे भी यही सिद्ध होता है । “ब्रह्माश्रमपदे वसेत्” इस स्मृतिके अनुसार ज्ञानप्राप्तिके
[पाद-टिप्पणी] १. ब्रह्माश्रम [अर्थात् ब्रह्मज्ञानके साधनभूत संन्यासाश्रम] में निवास करे ।