ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 28, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ें१८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
ब्रह्मचर्यादिविद्यासाधनानां च | साधन ब्रह्मचर्यादिकी सिद्धि भी सम्यक् साकल्येनात्याश्रमिषूपपत्तेर्गाहं- | रीतिसे संन्यासियोंमें ही हो सकती है, स्थ्येऽसंभवात् । न चासंपन्नं साधनं | क्योंकि गृहस्थाश्रममें उन साधनोंका कस्यचिदर्थस्य साधनायालम् । | होना असम्भव है; और अपूर्ण साधन यद्विज्ञानोपयोगीनि च गार्हस्थ्या- | किसी अर्थको सिद्ध करनेमें समर्थ श्रमकर्माणि तेषां परमफलमुप- | नहीं है । गृहस्थाश्रमके कर्म जिस संहृतं देवताप्पयलक्षणं संसार- | विज्ञानमें उपयोगी हैं उसके देवतामें विषयमेव । यदि कर्मिण एव | लय होनारूप संसारविषयक परम परमात्मविज्ञानमभविष्यत् संसा- | फलका उपसंहार किया जा चुका है। रविषयस्यैव फलस्योपसंहारो | यदि कर्मीको ही परमात्माका साक्षात् नोपापत्स्यत् । | ज्ञान हुआ करता तो संसारविषयक अङ्गफलं तदिति चेन्न । तद्वि- | फलका उपसंहार ( अन्त ) होना [हाशिया: देवताप्ययस्य ज्ञानाङ्गत्वनिरासः] रोध्यात्मवस्तुविषय- | कभी सम्भव ही न था । त्वादात्मविद्यायाः । | यदि कहो कि वह तो अङ्गफल- निराकृतसर्वनामरूपकर्मपरमार्थ- | मात्र है * तो ऐसा कहना ठीक त्मवस्तुविषयं ज्ञानममृतत्वसा- | नहीं, क्योंकि आत्मविद्या तो उसके धनम् । गुणफलसंबन्धे हि नि- | विरोधी आत्मतत्त्वसे सम्बन्ध रखने- राकृतसर्वविशेषात्मवस्तुविषयत्वं | वाली है । सब प्रकारके नाम, रूप ज्ञानस्य न प्राप्नोति । तच्चानिष्टम्, | और कर्मसे रहित परमार्थ आत्मतत्त्व- | से सम्बन्ध रखनेवाला आत्मज्ञान | तो अमरत्वका साधन है । उससे | गौण फलका सम्बन्ध माननेपर तो | ज्ञानका सर्वविशेषशून्य आत्मवस्तुसे | सम्बन्धित होना ही सिद्ध नहीं | होता । और यह इष्ट नहीं है,
* अर्थात् देवतादयरूप जो संसारविषयक फल है वह कर्मका अंग—गौण फल है, मुख्य फल तो परमात्माका साक्षात्कार ही है।