भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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पृष्ठ 32

२२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ तदसद्; व्युत्थानस्यैवार्थ- | ऐसा कहना ठीक नहीं । प्राप्तत्वान्नान्यत्रावस्थानं स्यात् । | व्युत्थानके स्वतः प्राप्त होनेके कारण ही उसकी अन्यत्र [ यानी अन्यत्रावस्थानस्य कामकर्म- | गृहस्थाश्रममें ] स्थिति नहीं हो सकती । अन्यत्र स्थितिको तो हमने प्रयुक्तत्वं ह्यवोचाम, तदभाव- | कामना और कर्मसे प्रेरित ही बतलाया है; और उसके अभावको मात्रं व्युत्थानमिति च । | ही व्युत्थान कहा है । यथाकामित्वं तु विदुषोऽत्यन्त- | स्वेच्छाचार तो अत्यन्त मूढ़का [विदुषो यथा-] मप्राप्तं अत्यन्तमूढ- | विषय समझा गया है, इसलिये विद्वान् [कामित्वनिषेधः] विषयत्वेनावगमात् । | के लिये वह अत्यन्त अप्राप्त है। तथा विद्वान्‌के लिये तो अत्यन्त भाररूप तथा शास्त्रचोदितमपि कर्म | होनेके कारण शास्त्रोक्त कर्मकी भी आत्मविदोऽप्राप्तं गुरुभारताव- | अप्राप्ति समझी जाती है । फिर गम्यते । किमुतात्यन्ताविवेक- | अत्यन्त अविवेकके कारण होनेवाले स्वेच्छाचारकी तौ बात ही क्या है? निमित्तं यथाकामित्वम् । न हि | उन्माद अथवा तिमिररोगसे दूषित उन्मादतिमिरदृष्ट्युपलब्धं वस्तु | दृष्टिद्वारा उपलब्ध हुई वस्तु उसके निवृत्त हो जानेपर भी वैसी ही तदपगमेऽपि तथैव स्यात् । | नहीं रहती, क्योंकि वह तो उन्माद उन्मादतिमिरदृष्टिनिमित्तत्वादेव | अथवा तिमिरदृष्टिके कारण ही वैसी प्रतीत होती है । अतः यह तस्य । तस्मादात्मविदो व्यु- | सिद्ध हुआ कि आत्मवेत्ताके लिये त्थानव्यतिरेकेण न यथाकामित्वं | व्युत्थानको छोड़कर न तो स्वेच्छा-चार ही है और न कोई अन्य न चान्यत्कर्तव्यमित्येतत्सिद्धम् । | कर्तव्य ही शेष रहता है ।