भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३


मूल एवं भाष्यभाष्यार्थ
यत्तु—“विद्यां चाविद्यां च<br><sub>[हाशिया: विदुषो ज्ञानकर्म-समुच्चयानुपपत्तिः]</sub> यस्तद्वेदोभयँसह” ( ई० उ० ११ ) इति न विद्यावतो विद्यया सहाविद्यापि वर्तते इत्ययमर्थः; कस्तर्हि एकस्मिन्पुरुषे एते एकदैव न सह संबध्येयातामित्यर्थः । यथा शुक्तिकायां रजतशुक्तिकाज्ञाने एकस्य पुरुषस्य । “दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता” ( क० उ० १ । २ । ४ ) इति हि काठके । तस्मान्न विद्यायां सत्यामविद्यासंभवोऽस्ति ।तथा ऐसा जो कहा है कि “जो पुरुष विद्या और अविद्या दोनोंको साथ-साथ जानता है” वह इसलिये नहीं है कि विद्वान्में विद्याके साथ अविद्या भी रहती है। तो फिर उसका क्या प्रयोजन है ? उसका तात्पर्य तो यही है कि एक ही पुरुषमें ये दोनों साथ-साथ नहीं रह सकते; जिस प्रकार कि सीपीमें एक पुरुषको [ एक ही समय ] चाँदी और सीपी दोनोंका ज्ञान नहीं हो सकता । कठोपनिषद्‌में भी कहा है—“जो विद्या और अविद्या नामसे जानी जाती हैं वे परस्पर अत्यन्त विपरीत (विरुद्ध स्वभाववाली) हैं ।” अतः विद्याके रहते हुए अविद्याका रहना किसी प्रकार सम्भव नहीं है ।
“तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व” ( तै० उ० ३ । २ ) इत्यादि-श्रुतेः, तपआदि विद्योत्पत्तिसाधनं गुरुपासनादि च कर्म अविद्यात्मकत्वादविद्योच्यते तेन विद्यामुत्पाद्य मृत्युं काममतितरति । ततो निष्कामस्त्यक्तैषणो ब्रह्मविद्यया अमृतत्वमश्नुत इत्ये-“तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर” इत्यादि श्रुतिके अनुसार तप आदि विद्योत्पत्तिके साधन और गुरुकी उपासना आदि कर्म अविद्यामय होनेके कारण 'अविद्या' कहे जाते हैं । उस अविद्यारूप कर्मसे विद्याको उत्पन्न करके वह मृत्यु यानी कामनाको पार कर जाता है। तब वह निष्काम और एषणामुक्त पुरुष ब्रह्मविद्यासे अमरत्व प्राप्त कर लेता है—