ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ तमर्थं दर्शयन्नाह—"अविद्यया | इसी अर्थको प्रदर्शित करते हुए कहते मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते" | हैं कि "अविद्यासे मृत्युको पारकर (ई० उ० ११) इति । | विद्यासे अमरत्व प्राप्त कर लेता है।" यत्तु पुरुपायुः सर्वं कर्मणैव | "कर्म करते हुए ही सौ वर्षतक [उपसंहारः] व्याप्तं "कुर्वन्नेवेह | जीवित रहनेकी इच्छा करे" इस कर्माणि जिजीवि- | मन्त्रद्वारा जो यह कहा गया था कि षेच्छत्ँ समाः" (ई० उ० २) | पुरुषकी सारी आयु कर्मसे ही व्याप्त है इति तदविद्वद्विषयत्वेन परिहृत- | उसका 'वह अविद्वान्से सम्बन्ध रखने- मितरथासंभवात् । यत्तु वक्ष्य- | वाला है'—ऐसा बतलाकर खण्डन कर माणमपि पूर्वोक्ततुल्यत्वात्कर्म- | दिया गया, क्योंकि अन्य प्रकार वैसा णाविरुद्धमात्मज्ञानमिति, तत्स- | होना असम्भव है । तथा तुमने जो विशेषनिर्विशेषतात्मतया प्रत्युक्तम्, | कहा था कि आगे कहा जानेवाला उत्तरत्र व्याख्याने च दर्शयि- | आत्मज्ञान भी पूर्वोक्त [श्रुतिकथित] ष्यामः । अतः केवलनिष्क्रिय- | ज्ञानके तुल्य होनेके कारण कर्मसे ब्रह्मात्मैकत्वविद्यादर्शनार्थमुत्तरो | अविरुद्ध ही है उस कथनको भी ग्रन्थ आरभ्यते— | सविशेष और निर्विशेष आत्मविषयक | बतलाकर खण्डन कर चुके हैं और | आगेकी व्याख्यामें इसका दिग्दर्शन भी | करायेंगे। अब यहाँसे केवल निष्क्रिय | ब्रह्म और आत्माकी एकताका ज्ञान | प्रदर्शित करनेके लिये आगेका ग्रन्थ | आरम्भ किया जाता है— आत्माके ईक्षणपूर्वक सृष्टि ॐ आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् । नान्य- त्किंचन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ॥ १ ॥