ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 35, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ पहले यह [ जगत् ] एकमात्र आत्मा ही था; उसके सिवा और कोई सक्रिय वस्तु नहीं थी । उसने यह सोचा कि 'लोकोंकी रचना करूँ' ॥ १ ॥ आत्मा आप्नोतेरत्तेरततेर्वा | [व्याप्तिबोधक] 'आप्',[भक्षणा- परः सर्वज्ञः सर्वशक्तिरशनाया- | र्थक] 'अद्' अथवा [सतत गमन- | बोधक ] 'अत्' धातुसे 'आत्मा' दिशर्वसंसारधर्मवर्जितो नित्य- | शब्द निष्पन्न हुआ है । यह जो | नाम, रूप और कर्मके भेदसे विविध- शुद्धबुद्धमुक्तस्वभावोऽजोऽजरो- | रूप प्रतीत होनेवाला जगत् कहा गया | है वह पहले यानी संसारकी सृष्टिसे ऽमरोऽमृतोऽभयोऽद्वयो वै; इदं | पूर्व सर्वश्रेष्ठ, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, | क्षुधा-पिपासा आदि सम्पूर्ण सांसारिक यदुक्तं नामरूपकर्मभेदभिन्नं जग- | धर्मोंसे रहित, नित्य-शुद्ध-बुद्ध- दात्मैवैकोऽग्रे जगतः सृष्टेः | मुक्तस्वभाव, अजन्मा, अजर, अमर, | अमृत, अभय और अद्वयरूप आत्मा प्रागासीत् । | ही था । किं नेदानीं स एवैकः ? | पूर्व०-क्या इस समय भी एक- | मात्र वही नहीं है ? न । | सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है। कथं तर्ह्यासीदित्युच्यते ? | पूर्व०-तो फिर 'आसीत् (था)' | ऐसा क्यों कहा है ? यद्यपीदानीं स एवैकस्तथा- | सिद्धान्ती-यद्यपि इस समय भी | अकेला वही है तो भी कुछ विशेषता प्यस्ति विशेषः । प्रागुत्पत्तेरव्या- | अवश्य है । [वह विशेषता यही | है कि ] उत्पत्तिसे पूर्व यह कृतनामरूपभेदमात्मभूतमात्मैक- | जगत् नाम-रूपादि भेदके व्यक्त न | होनेके कारण आत्मभूत और एक शब्दप्रत्ययगोचरं जगदिदानीं | 'आत्मा' शब्दकी प्रतीतिका ही ऐतरेयो० २—