ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 38, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ें२८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ उसने अम्भ, मरीचि, मर और आप्—इन लोकोंकी रचना की। जो द्युलोकसे परे है और स्वर्ग जिसकी प्रतिष्ठा है वह 'अम्भ' है, अन्तरिक्ष (भुवर्लोक) 'मरीचि' है, पृथिवी 'मर-लोक' है और जो [पृथिवीके] नीचे है वह 'आप' है ॥ २ ॥ स आत्मेमाँल्लोकानसृजत | उस आत्माने इन लोकोंकी रचना की। जिस प्रकार इस लोकमें सृष्टवान् । यथेह बुद्धिमांस्तक्षादि- | बुद्धिमान् शिल्पकार आदि 'मैं इस प्रकारके महल आदि बनाऊँ' रेवंप्रकारान्प्रासादादीन्सृज इति | ऐसा विचार करके उस विचारके ईक्षित्वेक्षानन्तरं प्रासादादीन्सृज- | अनन्तर ही महल आदिकी रचना करते हैं उसी प्रकार [उसने ईक्षण ति तद्वत् । | करके इन लोकादिकी रचना की] । ननु सोपादानस्तक्षादिः प्रा- | शंका—शिल्पकारादि तो उन महल आदिकी उपादान सामग्रीसे सादादीन्सृजतीति युक्तं निरुपा- | युक्त होते हैं इसलिये वे महल आदिकी रचना करते हैं—ऐसा कहना दानस्त्वात्मा कथं लोकान् | ठीक ही है; किन्तु उपादान (सामग्री) से रहित आत्मा किस प्रकार सृजति ? | लोकोंकी रचना करता है ? नैष दोषः; सलिलफेनस्था- | समाधान—यह कोई दोष नहीं [निरुपादानस्य] नीये आत्मभूते | है, क्योंकि जलमें [व्यक्त न हुए] [आत्मनः सृष्टि-] नामरूपे अव्याकृते | फेनस्थानीय अव्याकृत नाम और [कर्तृत्वम्] रूप, जो आत्मस्वरूप और एकमात्र आत्मैकशब्दवाच्ये | 'आत्मा' शब्दके ही वाच्य हैं, व्याकृतफेनस्थानीयस्य जगतः | व्याकृत फेनस्वरूप जगत्के उपादान उपादानभूते संभवतः । तस्माद् | हो सकते हैं। अतः वह सर्वज्ञ