भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९

आत्मभूतनामरूपोपादानभूतः | आत्मा अपने आत्मभूत नाम और सन्सर्वज्ञो जगन्निर्मिमीत इत्य- | रूपका उपादानस्वरूप होकर जगत्- विरुद्धम् । | की रचना करता है—इसमें कोई | विरोध नहीं है । अथवा, यथा विज्ञानवान्मा- | अथवा जिस प्रकार बुद्धियुक्त यावी निरुपादान आत्मानमेव | मायावी कोई उपादान न होनेपर आत्मान्तरत्वेनाकाशेन गच्छन्त- | भी स्वयं अपनेहीको अपने अन्यरूपसे मिव निर्मिमीते, तथा सर्वज्ञो | आकाशमें चलता हुआ-सा बना लेता देवः सर्वशक्तिर्महामाय आत्मान- | है, उसी प्रकार वह सर्वशक्तिमान्, मेवान्तरत्वेन जगद्रूपेण नि- | महामायावी, सर्वज्ञ देव अपनेहीको र्मिमीत इति युक्ततरम् । एवं च | जगत्-रूप अपने अन्य स्वरूपसे रच सति कार्यकारणोभयासद्वाद्यादि- | लेता है—यह बहुत युक्तियुक्त ही पक्षाश्च न प्रसज्यन्ते सुनिरा- | है । ऐसा होनेपर कार्य और कारण- कृताश्च भवन्ति । | इन दोनोंको असत् बतलानेवालोंके | [असद्वाद आदि] पक्षोंकी प्राप्ति नहीं | होती, और उनका पूर्णतया निरा- | करण हो जाता है । कांल्लोकानसृजतेत्याह- | उसने किन लोकोंकी रचना [आत्मसृष्ट- अम्भो मरीचीर्मरमाप | की ? इसपर कहते हैं—अम्भ, लोकाख्यानम् इति । आकाशादि- | मरीची, मर और आप आदिकी । क्रमेण अण्डमुत्पाद्याम्भःप्रभृतीन् | उसने आकाशादि क्रमसे अण्डको लोकानसृजत । तत्राम्भःप्रभृतीन् | उत्पन्न कर अम्भ आदि लोकोंकी स्वयमेव व्याचष्टे श्रुतिः । | रचना की । उन अम्भ आदि लोकों- | की श्रुति स्वयं ही व्याख्या करती है । अदस्तदम्भःशब्दवाच्यो लोकः, | अदः—वह 'अम्भ' शब्दसे कहा परेण दिवं द्युलोकात्परेण पर- | जानेवाला लोक है, जो द्युलोकसे स्तात्; सोऽम्भःशब्दवाच्यः, अम्भो- | परे है; वह जल (मेघों) को धारण