ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 40, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ें३० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ भरणात् । द्यौः प्रतिष्ठाश्रयस्तस्या- | करनेवाला होनेसे 'अम्भ' शब्दसे | कहा जाता है। उस अम्भलोकका म्भसो लोकस्य । द्युलोकादधस्ता- | द्युलोक प्रतिष्ठा यानी आश्रय है। | द्युलोकसे नीचे जो अन्तरिक्ष है वह दन्तरिक्षं यत्तन्मरीचयः । ए- | मरीचि लोक है। वह एक होनेपर भी | अनेकों स्थानभेदोंके कारण 'मरीचयः' कोऽप्यनेकस्थानभेदत्वाद्वहुवच- | इस प्रकार बहुवचनरूपसे प्रयुक्त नभाक्-मरीचय इति; मरीचि- | हुआ है। अथवा किरणोंसे सम्बन्धित | होनेके कारण वह 'मरीचि' कह- भिर्वा रश्मिभिः सम्बन्धात् । पृथिवी | लाता है। पृथिवी 'मर' है, क्योंकि | उसमें प्राणी मरते हैं। जो लोक मरो म्रियन्तेऽस्मिन् भूतानीति । | पृथिवीसे नीचेकी ओर हैं वे 'आप' | कहलाते हैं, क्योंकि 'अप्' शब्द या अधस्तात् पृथिव्यास्ता आप | [नीचेके लोकोंमें रहनेवाले प्राणियों- | द्वारा प्राप्य होनेके कारण प्राप्तिरूप उच्यन्ते; आप्नोतेः, लोकाः । यद्यपि | अर्थवाले ] 'आप्' धातुसे बना हुआ | है। यद्यपि सभी लोक पञ्चभूतमय पञ्चभूतात्मकत्वं लोकानां तथा- | हैं तथापि अम्भ, मरीचि, मर और प्यब्बाहुल्यादब्नामभिरेवाम्भो | आप-ये लोक आप (जल) की | अधिकता होनेके कारण 'आप' मरीचीर्मरमाप इत्युच्यन्ते ॥२॥ | ही कहे जाते हैं ॥ २ ॥ पुरुषरूप लोकपालकी रचना सर्वप्राणिकर्मफलोपादानाधि- | सम्पूर्ण प्राणियोंके कर्मफलरूप ष्ठानभूतांश्चतुरो लोकान् सृष्ट्वा- | उपादानके अधिष्ठानभूत चारों | लोकोंकी रचना कर- स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्छयत् ॥ ३ ॥