भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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पृष्ठ 43

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३

एवम् । तस्मान्निर्भिन्ना- | छिद्ररूप मुखसे वाक्-इन्द्रिय उत्पन्न न्मुखाद्वाकरणमिन्द्रियं निरवर्तत; | हुई और उस वाक् से वाणीका तदधिष्ठाताग्निस्ततो वाचो लोक- | अधिष्ठाता लोकपाल अग्नि हुआ । पालः । तथा नासिके निरभिद्ये- | इसी प्रकार नासिकारन्ध्र उत्पन्न हुए, ताम् । नासिकाभ्यां प्राणः, | उन नासिकारन्ध्रोंसे प्राण और प्राणाद्वायुः, इति सर्वत्राधिष्ठानं | प्राणसे वायु हुआ । इस प्रकार सभी करणं देवता च त्रयं क्रमेण | जगह इन्द्रियगोलक, इन्द्रिय और निर्भिन्नमिति । अक्षिणी कर्णौ | उसके अधिष्ठाता देव-ये तीनों ही त्वग् हृदयमन्तःकरणाधिष्ठानम्, | क्रमशः उत्पन्न हुए । दो नेत्र, दो मनोऽन्तःकरणम् । नाभिः सर्व- | कान और त्वचा [-ये इन्द्रियस्थान प्राणबन्धनस्थानम्। अपानसंयुक्त- | हैं], हृदय अन्तःकरणका अधिष्ठान त्वादपान इति पाय्विन्द्रियमुच्यते। | है और मन अन्तःकरण है। नाभि तस्मात् तस्याधिष्ठात्री देवता | सम्पूर्ण प्राणोंके बन्धनका स्थान है। मृत्युः । यथान्यत्र, तथा शिश्नं | अपान वायुयुक्त होनेके कारण पायु निरभिद्यत प्रजननइन्द्रियस्थानम् । | इन्द्रिय अपान कहलाती है; उससे इन्द्रियं रेतो रेतोविसर्गार्थत्वा- | उसकी अधिष्ठात्री देवता मृत्यु उत्पन्न त्सद्द रेतसोच्यते । रेतस आप | हुई । जैसे कि अन्यत्र [इन्द्रिय, इति ॥ ४ ॥ | इन्द्रियस्थान और देवता] बतलाये | गये हैं, उसी प्रकार प्रजननइन्द्रियका | आश्रयस्थान शिश्न उत्पन्न हुआ । | उसमें रेतः इन्द्रिय है, जो रेतोविसर्ग | (वीर्यत्याग) की हेतुभूत होनेसे रेतः | (वीर्य) के सम्बन्धसे 'रेतस्' कही | जाती है और रेतःसे आप (वीर्यके | अधिष्ठाता जल) का प्रादुर्भाव | हुआ ॥ ४ ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतावैतरेयोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये प्रथमः खण्डः समाप्तः ॥ १ ॥