भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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द्वितीय खण्ड देवताओंकी अन्न एवं आयतनयाचना ता एता देवता सृष्टा अस्मिन् महत्यर्णवे प्रापतंस्त- मशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जत् ता एनमब्रुवन्नायतनं नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति ॥ १ ॥ वे ये [इस प्रकार] रचे हुए [इन्द्रियाभिमानी] देवगण इस महासमुद्रमें पतित हो गये। उस (पिण्ड) को [परमात्माने] क्षुधा- पिपासासे संयुक्त कर दिया। तब उन इन्द्रियाभिमानी देवताओंने उससे कहा—'हमारे लिये कोई आश्रयस्थान बतलाइये, जिसमें स्थित होकर हम अन्न भक्षण कर सकें' ॥ १ ॥ ता एता अग्न्यादयो देवता | ईश्वरद्वारा लोकपालरूपसे संकल्प लोकपालत्वेन संकल्प्य सृष्टा | करके रचे हुए वे ये अग्नि आदि देवगण इस अति महान् संसारार्णव ईश्वरेणास्मिन्संसारार्णवे संसार- | —संसारसमुद्रमें [गिरे], जो (संसार- समुद्र) अविद्या, कामना और कर्मसे समुद्रे महत्यविद्याकामकर्मप्रभव- | उत्पन्न हुए दुःखरूप जल तथा तीव्र दुःखोदके तीव्ररोगजरामृत्यु- | रोग, जरा और मृत्युरूप महाग्राहोंसे पूर्ण है, अनादि अनन्त अपार एवं महाग्राहेऽनादावनन्तेऽपारे निरा- | निरालम्ब है, विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला अणुमात्र सुख ही लम्बे विषयेन्द्रियजनितसुखलवक्ष- | जिसकी क्षणिक विश्रान्तिका स्वरूप णविश्रामे पञ्चेन्द्रियार्थतृणमारुत- | है, जिसमें पाँचों इन्द्रियोंकी विषय-