ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 48, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ें३८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ वह उनके लिये पुरुष ले आया। वे बोले—'यह सुन्दर बना है, निश्चय पुरुष ही सुन्दर रचना है।' उन (देवताओं) से ईश्वरने कहा— 'अपने-अपने आयतन (आश्रयस्थानों) में प्रवेश कर जाओ' ॥ ३ ॥ ताभ्यः पुरुषमानयत्स्वयोनि- | [ वह ] उनके लिये उनका भूतम् । ताः स्वयोनिं पुरुषं | योनिरूप पुरुष ले आया । अपने दृष्ट्वा अखिन्नाः सत्यः सुकृतं | योनिभूत उस पुरुषको देखकर वे शोभनं कृतमिदमधिष्ठानं बतेत्य- | खेदरहित हो इस प्रकार बोले—'यह ब्रुवन् । तस्मात्पुरुषो वाव पुरुष | अधिष्ठान सुन्दर बना है । अतः एव सुकृतं सर्वपुण्यकर्महेतुत्वात् । | सम्पूर्ण पुण्यकर्मोंका कारण होनेसे स्वयं वा स्वेनैवात्मना स्वमायाभिः | निश्चय पुरुष ही सुकृत है । अथवा कृतत्वात्सुकृतमित्युच्यते । | स्वयं अपने-आप अपनी ही मायासे रचा होनेके कारण 'सुकृत' ऐसा कहा जाता है । ता देवता ईश्वरोऽब्रवीदिष्ट- | ईश्वरने, यह समझकर कि इन्हें मासामिदमधिष्ठानमिति मत्वा, | यह आश्रयस्थान प्रिय है, क्योंकि सर्वे हि स्वयोनिषु रमन्ते, अतो | सभी अपनी योनिमें सन्तुष्ट रहा यथायतनं यस्य यद्वदनादिक्रिया- | करते हैं, उन देवताओंसे कहा— योग्यमायतनं तत्प्रविशतेति॥३॥ | 'जिसका जो आयतन है उस अपनी सम्भाषणादि क्रियाके योग्य आयतन- में तुम सब प्रविष्ट हो जाओ' ॥३॥ देवताओंका अपने-अपने आयतनोंमें प्रवेश तथास्त्वित्यनुज्ञां प्रतिलभ्ये- | 'ऐसा ही हो' इस प्रकार श्वरस्य नगर्यामिव बलाधिकृता- | राजाकी आज्ञा पाकर जिस प्रकार दयः— | नगरीमें सेनाध्यक्षादि [ प्रवेश कर जाते हैं उसी प्रकार ]—