भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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पृष्ठ 49

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९

अग्निर्वादभूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश्चक्षुर्भूत्वाक्षिणी प्राविशद्दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशंश्चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशन्मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन् ॥ ४ ॥ अग्निने वागिन्द्रिय होकर मुखमें प्रवेश किया, वायुने प्राण होकर नासिका-रन्ध्रोंमें प्रवेश किया, सूर्यने चक्षु-इन्द्रिय होकर नेत्रोंमें प्रवेश किया, दिशाओंने श्रवणेन्द्रिय होकर कानोंमें प्रवेश किया, ओषधि और वनस्पतियोंने लोम होकर त्वचा में प्रवेश किया, चन्द्रमाने मन होकर हृदयमें प्रवेश किया, मृत्युने अपान होकर नाभिमें प्रवेश किया तथा जलने वीर्य होकर लिङ्गमें प्रवेश किया ॥ ४ ॥


[संस्कृत-भाष्य][हिन्दी-अनुवाद]
अग्निर्वागभिमानी वागेव भूत्वा स्वां योनिं मुखं प्राविशत्तथोक्तार्थमन्यत् । वायुर्नासिके आदित्योऽक्षिणी दिशः कर्णौ ओषधिवनस्पतयस्त्वचं चन्द्रमा हृदयं मृत्युर्नाभिमापः शिश्नं प्राविशन् ॥ ४ ॥वागिन्द्रियके अभिमानी अग्निने वाक् होकर अपने कारणस्वरूप मुखमें प्रवेश किया । इसी प्रकार औरोंका भी अर्थ समझना चाहिये । [ इस प्रकार ] वायुने नासिका में, सूर्यने नेत्रोंमें, दिशाओंने कानोंमें, ओषधि और वनस्पतियोंने त्वचा में, चन्द्रमाने हृदयमें, मृत्युने नाभिमें और जलने शिश्न (लिङ्ग) में प्रवेश किया ॥ ४ ॥

क्षुधा और पिपासाका विभाग

[संस्कृत-भाष्य][हिन्दी-अनुवाद]
एवं लब्धाधिष्ठानासु देवतासु—इस प्रकार देवताओंके आश्रय पा लेनेपर—