ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 50, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ें४० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ तमशनायापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभिप्रजानीहीति। ते अब्रवीदेतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति । तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते भागिन्यावेवास्यामशनायापिपासे भवतः ॥ ५ ॥ उस ( ईश्वर ) से क्षुधा-पिपासाने कहा—'हमारे लिये आश्रयकी योजना कीजिये।' तब [उसने] उनसे कहा—'तुम दोनोंको मैं इन देवताओंमें ही भाग दूँगा अर्थात् मैं तुम्हें इन्हींमें भागीदार करूँगा।' अतः जिस किसी देवताके लिये हवि दी जाती है उस देवताकी हविमें ये भूख-प्यास भी भागीदार होती ही हैं ॥ ५ ॥ निरधिष्ठाने सत्यौ अशनाया- | क्षुधा और पिपासाने आश्रयहीन पिपासे तमीश्वरमब्रूतामुक्तवत्यौ। | होनेके कारण उस ईश्वरसे कहा— आवाभ्यामधिष्ठानमभिप्रजानीहि | 'हमारे लिये अधिष्ठानका अभिप्रज्ञान- चिन्तय विधत्स्वेत्यर्थः । स | चिन्तन अर्थात् विधान करो।' ऐसा ईश्वर एवमुक्तस्ते अशनायापिपासे | कहे जानेपर उस ईश्वरने उन क्षुधा- अब्रवीत् । न हि युवयोर्भावरूप- | पिपासाओंसे कहा—'भावरूप होनेके त्वाच्चेतनावद्वस्त्वनाश्रित्यान्नात्तृ- | कारण तुम दोनोंका किसी चेतन त्वं संभवति । तस्मादेतास्वेवा- | वस्तुको आश्रय किये बिना अन्न ग्न्याद्यासु वां युवां देवतास्वध्या- | भक्षण करना सम्भव नहीं है। अतः मैं त्माधिदेवतास्वाभजामि वृत्ति- | इन अध्यात्म और अधिदैव अग्नि आदि | देवताओंमें ही तुम दोनोंको आभा- संविभागेनानुगृह्णामि । एतासु : | जित करता हूँ अर्थात् तुम्हारी वृत्ति- | का विभाग करके अनुगृहीत करता