भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१ भागिन्यौ यद्देवत्यो यो भागो | हूँ। मैं तुम्हें इन देवताओंमें ही भागी हविरादिलक्षणः स्यात्तस्यास्ते- | करता हूँ-अर्थात् जिस देवताका नैव भागेन भागिन्यौ भागवत्यौ | जो हवि आदि भाग है उसके उसी वां करोमीति सृष्ट्यादाइीश्वर | भागसे मैं तुम्हें उनकी भागिनी-भाग एवं व्यदधाद्यस्मात्तस्मादिदानी- | ग्रहण करनेवाली बनाता हूँ, मपि यस्यै कस्यै च देवतायै | क्योंकि सृष्टिके आदिमें ईश्वरने ऐसी अर्थाय हविर्गृह्यते चरुपुरोडाशा- | व्यवस्था कर दी थी इसलिये इस दिलक्षणं भागिन्यावेव भागव- | समय भी जिस किसी देवताके लिये त्यावेवास्यां देवतायामशनाया- | चरु पुरोडाशादि हवि ग्रहण की पिपासे भवतः ॥ ५ ॥ | जाती है ये क्षुधा-पिपासा भी उस | देवतामें भागिनी होती ही हैं ॥५॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतावैतरेयोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये द्वितीयः खण्डः समाप्तः ॥ २ ॥