भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 108 में से

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तृतीय खण्ड अन्नरचनाका विचार स ईक्षतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा इति ॥ १ ॥ उस (ईश्वर) ने विचारा ये लोक और लोकपाल तो हो गये अब इनके लिये अन्न रचूँ ॥ १ ॥ स एवमीश्वर ईक्षत, कथम् ? | उस ईश्वरने इस प्रकार ईक्षण | किया-किस प्रकार ? [सो इमे नु लोकाश्च लोकपालाश्च | बतलाते हैं-] मैंने इन लोक और | लोकपालोंकी रचना तो कर दी मया सृष्टा अशनायापिपासाभ्यां | और इन्हें क्षुधा-पिपासासे संयुक्त च संयोजिताः; अतो नैषां | भी कर दिया । अतः अन्नके बिना स्थितिरन्नमन्तरेण।तस्मादन्नमेभ्यो | इनकी स्थिति नहीं हो सकती; | इसलिये इन लोकपालोंके लिये मैं लोकपालेभ्यः सृजै सृज इति । | अन्न रचूँ । एवं हि लोके ईश्वराणामनुग्रहे | इस प्रकार लोकमें ईश्वरों | (समर्थों) की अपने लोगोंके ऊपर निग्रहे च स्वातन्त्र्यं दृष्टं स्वेषु । | अनुग्रह एवं निग्रह करनेकी तद्वन्महेश्वरस्यापि सर्वेश्वरत्वा- | स्वतन्त्रता देखी जाती है । इसी | प्रकार सर्वेश्वर होनेके कारण महेश्वर त्सर्वान्प्रति निग्रहानुग्रहेऽपि | (परमेश्वर) की भी सबके प्रति निग्रह स्वातन्त्र्यमेव ॥ १ ॥ | एवं अनुग्रहमें स्वतन्त्रता ही है ॥ १ ॥

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