भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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[ २ ] यह शंका नहीं की जा सकती कि उसे ऋणत्रयको निवृत्ति किये बिना संन्यासका अधिकार नहीं है, क्योंकि गृहस्थाश्रमको स्वीकार करनेसे पूर्व तो उसका ऋणी होना ही सम्भव नहीं है। अतः आचार्यका सिद्धान्त है कि जिसे आत्मतत्त्वकी जिज्ञासा है और जो साध्य-साधनरूप अनित्य संसारसे मुक्त होना चाहता है, वह किसी भी आश्रममें हों उसे, संन्यास ग्रहण करना ही चाहिये। इस सिद्धान्तके मुख्य आधार दो ही हैं—(१) जिज्ञासुको तो इसलिये गृहत्याग करना चाहिये कि उसके लिये गृहस्थाश्रममें रहते हुए ज्ञानोपयोगिनी साधनसम्पत्तिको उपार्जन करना कठिन है और (२) बोधवान्‌में कामनाओंका सर्वथा अभाव हो जाता है, इसलिये उसका गृहस्थाश्रममें रहना सम्भव नहीं है। अतः ज्ञानोपयोगिनी साधन- सम्पत्तिको उपार्जन करना तथा कामनाओंका अभाव—ये ही गृहत्यागके मुख्य हेतु हैं। जो लोग घरमें रहते हुए ही शम-दमादि साधनसम्पन्न हो सकते हैं और जिन बोधवानोंकी निष्कामतामें अपने गृहविशेषमें रहना बाधक नहीं होता वे घरमें रहते हुए भी ज्ञानोपार्जन और ज्ञानरक्षा कर ही सकते हैं। वे स्वरूपसे संन्यासी न होनेपर भी वस्तुतः संन्यासधर्मसम्पन्न होनेके कारण आचार्यके मतका ही अनुसरण करनेवाले हैं। अस्तु। इस उपनिषद्‌में तीन अध्याय हैं। उनमेंसे पहले अध्यायमें तीन खण्ड हैं तथा दूसरे और तीसरे अध्यायोंमें केवल एक-एक खण्ड है। प्रथम अध्यायमें यह बतलाया गया है कि सृष्टिके आरम्भमें केवल एक आत्मा ही था, उसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था। उसने लोक- रचनाके लिये ईक्षण ( विचार ) किया और केवल संकल्पसे ही अम्भ, मरीचि और मर—इन तीन लोकोंकी रचना की। इन्हें रचकर उस परमात्माने उनके लिये लोकपालोंकी रचना करनेका विचार किया और जलसे ही एक पुरुषकी रचनाकर उसे अवयवयुक्त किया। परमात्माके सङ्कल्पसे ही उस विराट् पुरुषके इन्द्रिय, इन्द्रियगोलक और इन्द्रियाधिष्ठाता